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kabir
@kabir

May 2026

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4Monday

रात के कोई दस बजे थे। रफ़ीक़ भाई के फ़्लैट में — हाज़रा से थोड़ा अंदर, वह तंग गली जहाँ ऑटो नहीं जाते — हम तीन लोग बैठे थे और पुरानी vinyl घूम रही थी। उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब, राग मारवा, शायद EMI Odeon की कोई pressing — record के ऊपर release year नहीं छपा था, रफ़ीक़ भाई का अंदाज़ा था कि sixties की आख़िर या seventies की शुरुआत की होगी। बाहर मई की पहली बारिश का इशारा था, और उस humid हवा में needle का surface noise एक अजीब warmth ले आई।

मारवा संध्या का राग है — वह संध्या जो अँधेरे में जाने से पहले एक पल के लिए रुकती है। कोमल रे और शुद्ध ध का जो tension है इस राग में, वह किसी resolution की माँग नहीं करता, बस hanging रहना चाहता है। अमीर ख़ाँ साहब का यही तरीक़ा था — वे उस tension को resolve नहीं करते, उसमें रहते हैं। पहले पाँच-सात मिनट के आलाप में वे रे और ध के बीच इस तरह घूमे जैसे कोई जाना-पहचाना कमरा हो, जिसमें furniture की जगह याद हो।

शिल्प की बात करें तो यह recording एकदम sparse है। कोई तबला नहीं आलाप में, कोई सारंगी का fill नहीं जो gap भरे। सिर्फ़ आवाज़ और तानपुरे का drone — जो कि इस राग की माँग भी है, क्योंकि मारवा में लय का अनुशासन बाद में आता है, पहले राग की हवा पकड़नी होती है। मुझे ऐसा सुनाई दिया कि यहाँ कोई demonstration नहीं था — कोई "देखो मैं मारवा जानता हूँ" — बस एक व्यक्ति किसी जगह बैठा है।

एक जगह — recording के शायद बाईसवें-तेईसवें मिनट के आसपास — आवाज़ में एक strain आई। हो सकता है studio acoustics की बात हो, हो सकता है microphone placement। वह लम्हा टूटा। लेकिन उसने मुझे यह भी याद दिलाया कि यह एक इंसान है जो गा रहा है, कोई आदर्श नहीं। और उससे पहले और उसके बाद जो था, वह कहीं और ले गया।

मारवा की एक सीमा यह है — या शायद यह मेरी सुनवाई की सीमा है — कि वह intimacy तो देता है, catharsis नहीं। यह भैरव नहीं है जो सुबह खोल दे, यह भीमपलासी नहीं है जो शाम को एक direction दे। मारवा बस वहीं छोड़ देता है जहाँ से शुरू किया था। अमीर ख़ाँ साहब ने इस recording में उस quality को accept किया है — कोई grand conclusion नहीं खींचा। मेरे लिए यह उनकी ईमानदारी थी, हालाँकि मैं ग़लत भी हो सकता हूँ।

रफ़ीक़ भाई ने record उठाई, मैंने पानी माँगा। बारिश हो गई थी।

#शास्त्रीय_संगीत #हिंदुस्तानी_संगीत #डायरी_नोट #सुनवाई

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9Saturday

"रंजिश ही सही" के उस हिस्से में — जहाँ मेहँदी हसन साहब एक ही शब्द पर तीन बार लौटते हैं, पहली बार सवाल की तरह, दूसरी बार जवाब की तरह, तीसरी बार जैसे दोनों थक गए हों — Asim के पुराने turntable की needle हल्की-सी कंपी। रात के ग्यारह बज रहे थे। बत्ती बंद थी, सिर्फ़ गली की रोशनी खिड़की से आ रही थी।

यह Ghazals का वह vinyl था जिसे Asim ने Lahore के किसी पुराने बाज़ार से लाया था — शायद सत्तर के दशक का कोई HMV release, सन् मुझे ठीक याद नहीं। Recording में एक बारीक hiss है जो कभी-कभी singer की साँस के साथ मिल जाती है। यह editing की ग़लती नहीं लगती — उस ज़माने की studio acoustics का हिस्सा है, एक कमरे में, microphone पास, reverb बहुत कम।

मेहँदी हसन साहब का tempo से रिश्ता एक अलग तरह का है। वो उसे कभी abandon नहीं करते — यहाँ तक कि जब एक syllable को जान-बूझकर खींचते हैं, तबले की साँस के भीतर रहते हैं। इस recording में accompaniment बहुत sparse है — सारंगी, तबला, harmonium, बस। यह sparseness कोई limitation नहीं, एक deliberate choice लगती है जो singer को centre में रखती है। बाक़ी सब उनके इर्द-गिर्द चलता है, उनसे आगे नहीं जाता।

एक जगह मुझे थोड़ी बाधा हुई — mono mix में upper frequencies में एक flatness है जो stereo format में शायद खुलती। लेकिन यह उस युग के format की सीमा है, album की नहीं। यह काम वैसा नहीं जो concert hall के लिए बना हो — यह drawing room का, रात का, दो-तीन लोगों का काम है।

तीसरी सुनवाई पर मुझे लगा — और हो सकता है मैं ग़लत हूँ — कि इस ghazal में जो "सही" है वो resigned acceptance नहीं, बल्कि एक quiet insistence है। जैसे कोई तर्क नहीं कर रहा, सिर्फ़ वहाँ खड़ा है। Asim ने चाय रख दी थी। मैंने उठाई नहीं।

#मेहँदी_हसन #ग़ज़ल_डायरी #संगीत_नोट #vinyl

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