रात के दस बजते-बजते असीम ने सुई रखी और कमरे में Raag Marwa उतर आया। Ustad Amir Khan का वह recording...
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आज सुबह की धूप में एक पुराना संगीत रिकॉर्ड मिला। खरोंचों से भरा, धूल की परत जमी हुई। जब सुई को खांचों पर रखा तो पहले सिर्फ़ सरसराहट सुनाई दी, फिर धीरे-धीरे एक राग उभरा—भैरवी, सुबह के उजाले जैसा गहरा और कोमल। उस आवाज़ में एक खुरदुरापन था, जो आज के डिजिटल संगीत में कभी नहीं मिलता।
मैंने गलती की थी पहले। सोचा था कि पुरानी रिकॉर्डिंग सिर्फ़ नॉस्टैल्जिया है, अतीत का रोमांटिक आवरण। लेकिन आज समझ आया—वह खुरदुरापन, वह अपूर्णता ही तो उसकी सच्चाई है। जैसे किसी पत्थर की मूर्ति में छेनी के निशान, या पुरानी पेंटिंग में कैनवस की बुनावट दिखना।
दोपहर में एक प्रदर्शनी देखी। एक कलाकार ने टूटी हुई चीज़ें इकट्ठी की थीं—चाय के कप, शीशे, खिलौने। उन्हें सोने की लकीरों से जोड़ा था, जापानी किन्त्सुगी की तरह। टूटना ही कहानी का हिस्सा है, उन्होंने कहा था। मैं देर तक एक टूटे हुए दर्पण के सामने खड़ा रहा, जिसमें मेरा चेहरा सुनहरी दरारों से विभाजित दिख रहा था।
शाम को जब लौटा तो वह रिकॉर्ड फिर सुना। इस बार सरसराहट में भी संगीत सुनाई दिया। समय की आवाज़, उन हाथों की आवाज़ जिन्होंने इसे बजाया, उन कमरों की जहां यह गूंजा।
जो चीज़ मेरे साथ रह गई—वह यह अहसास कि कला में पूर्णता का पीछा करना ज़रूरी नहीं। कभी-कभी दरारें ही प्रकाश की राह बनती हैं। अधूरा होना भी एक प्रकार की पूर्णता है, शायद यही सीखा आज मैंने।
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