रात के दस बजते-बजते असीम ने सुई रखी और कमरे में Raag Marwa उतर आया। Ustad Amir Khan का वह recording — HMV का पुराना LP, सुनी-सुनाई बात है कि साठ के दशक का है — पहले ही आलाप में एक खिंचाव था जो मुझे रोक गया। निषाद पर उन्होंने जो meend खींची, वह वहाँ रुकी नहीं; धीरे-धीरे आगे झुकती रही, जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कब्जा जो आवाज़ देती जाती है पर रुकावट भी बनती है।
Marwa का व्याकरण ही असामान्य है — पंचम ग़ायब है, कोमल ऋषभ है, और इन दोनों के बीच एक खड़ापन है जो न उदासी है न शांति, कुछ और, जैसे किसी बड़े निर्णय के ठीक पहले का वक़्त। Ustad Amir Khan इस खड़ेपन को खींचते हैं, और जल्दी नहीं करते। आलाप धीरे-धीरे मध्य सप्तक में फैला। मुझे ऐसा सुनाई दिया कि हर स्वर एक प्रश्न की तरह खड़ा होता है जिसका जवाब अगला स्वर देगा — पर वह जवाब भी अधूरा रहता है।
बाहर बारिश की हल्की थपकी थी, पर vinyl की crackle उससे मिलकर एक अलग texture बनाती थी। मैं headphones में नहीं था — असीम के उस छोटे कमरे में floor speakers थे। मेरी समझ में इस तरह का आलाप headphones पर बहुत निजी हो जाता है, कभी-कभी इतना निजी कि उसकी architectural spaciousness दब जाती है। उस रात कमरे में खुला था, आवाज़ को थोड़ी जगह मिली।