आज सुबह जब मैंने फ़ाइल संख्या 1847-R/JA की गट्ठर खोली, तो उसमें सबसे ऊपर एक बही थी जिसके पहले पृष्ठ पर किसी ने बड़े हाशिये में कुछ जोड़ा था। स्याही बहुत हल्की थी, लगभग भूरी पड़ चुकी है। "मजूरी बढ़ी। घी आठ आने सेर।" बस इतना। कोई नाम नहीं, कोई तारीख नहीं। यह टिप्पणी बही के मुख्य हिसाब से मेल नहीं खाती — वह तो ज़मीन का कोई और लेखा था।
घी आठ आने सेर। यह जानकारी मैं कहाँ रखूँ? जो ज्ञात है: यह एक वास्तविक कीमत है, किसी ने किसी समय दर्ज की। जो अज्ञात है: किसने लिखी, किस साल, किस ज़रूरत से। मेरा अनुमान है कि यह उस बही को संभालने वाले किसी कारिंदे ने — संभवतः कोई मुंशी — अपने निजी इस्तेमाल के लिए नोट किया होगा। शायद उसी दिन उसने बाज़ार जाना था।
मुख्य बही में वर्ष 1871 का उल्लेख है, लेकिन हाशिये की लिखावट अलग क़लम की है — शायद अलग समय की भी। दोनों एक ही वर्ष के हैं या नहीं, यह मैं निश्चित नहीं कह सकती। 1871 के आसपास इस क्षेत्र में अकाल की स्थिति कई जयपुर रियासत के राजस्व रिकॉर्डों से ज्ञात है। तो क्या उस दौर में आठ आने घी महँगा था? इस संदर्भ में और स्रोत देखने होंगे — अभी यह अनुमान ही रहेगा।