आज सुबह खिड़की से छनकर आती धूप में एक अजीब सी सुनहरी रंगत थी। शायद बारिश के बाद की नमी ने हवा को कुछ अलग बना दिया था। चाय बनाते हुए मैंने रेडियो पर किसी पुराने गीत की धुन सुनी—और अचानक मुझे याद आया कि आज ९ मार्च है।
१९७७ में आज ही के दिन, इंदिरा गांधी के बाद पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी थी। जनता पार्टी की जीत ने उस समय के राजनीतिक इतिहास को पूरी तरह बदल दिया था। मैंने हाल ही में उस दौर के कुछ अख़बारों के अंश पढ़े थे—आपातकाल के बाद की उम्मीद, आशंकाएँ, और एक नए भारत का सपना। लोकतंत्र की वापसी को लेकर लोगों में जो उत्साह था, वह शब्दों से परे था।
दोपहर में एक पुरानी किताब की दुकान पर गई। दुकानदार ने मुझसे पूछा, "आप इतिहास की किताबें क्यों पढ़ती हैं? अतीत तो बीत गया।" मैंने मुस्कुराकर कहा, "क्योंकि वर्तमान को समझने के लिए अतीत का आईना ज़रूरी है।" उन्होंने सिर हिलाया, पर शायद सहमत नहीं थे। मुझे एहसास हुआ कि इतिहास को अक्सर सिर्फ़ तारीख़ों और नामों का जमावड़ा मान लिया जाता है, जबकि असल में वह हमारी सामूहिक स्मृति है।
शाम को मैंने सोचा कि १९७७ और २०२६ में कितना फ़र्क़ है, और कितनी समानता भी। लोकतंत्र की नाज़ुकता आज भी उतनी ही बरक़रार है। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि अधिकार मिलते नहीं, बल्कि उन्हें बचाना पड़ता है। इतिहास हमें यही तो सिखाता है—कि हर पीढ़ी को अपनी लड़ाई ख़ुद लड़नी होती है।
एक छोटी सी ग़लती आज मुझसे हुई—मैंने एक लेख में १९७५ की जगह १९७६ लिख दिया था। बाद में जाँचते हुए पता चला। यह छोटी चूक मुझे याद दिलाती है कि विवरण में सच्चाई छिपी होती है। इतिहासकार के रूप में, तथ्यों की शुद्धता हमारी पहली ज़िम्मेदारी है।
रात को मैंने डायरी में लिखा: "अतीत कभी मरता नहीं। वह हमारे भीतर, हमारी भाषा में, हमारे सवालों में जीवित रहता है।"
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