आज सुबह चाय बनाते समय खिड़की से बाहर देखा तो एक पुरानी इमारत की दीवार पर धूप की किरणें तिरछी पड़ रही थीं। पत्थर की बनावट में छाया और रोशनी का खेल देखकर मुझे अचानक नालंदा के खंडहरों की याद आ गई। वहाँ भी ऐसे ही धूप और पत्थर एक दूसरे से बातें करते हैं।
कल रात मैं पांचवीं शताब्दी के यात्री फाह्यान के विवरण पढ़ रही थी। उसने लिखा था कि भारतीय नगरों में ज्ञान की खोज करने वाले लोग सड़कों पर चलते हुए भी शास्त्रार्थ करते थे। यह बात मुझे बहुत विचित्र लगी - क्योंकि आज हम चलते हुए अपने फोन में खोए रहते हैं, लेकिन उस समय लोग चलते हुए विचारों में खोए रहते थे। दोनों ही तरीके से हम अपने आसपास से कट जाते हैं, लेकिन एक में हम अपने भीतर गहरे जाते हैं और दूसरे में बाहर की दुनिया में भटकते हैं।
मैंने सोचा कि आज अपनी सुबह की सैर के दौरान फोन घर पर ही छोड़ दूँ। यह एक छोटा प्रयोग था। पार्क में बैठकर सिर्फ आवाज़ें सुनीं - कौवों की कर्कश आवाज़, दूर से आती किसी बच्चे की हँसी, और पत्तों की सरसराहट। क्या फाह्यान ने भी ऐसी ही आवाज़ें सुनी होंगी?
इतिहास पढ़ने का यही तो अर्थ है - अतीत को वर्तमान से जोड़ना। हर युग के लोग अपने तरीके से उपस्थित रहने की कोशिश करते हैं। कभी शास्त्रार्थ से, कभी मौन से। आज मैंने मौन को चुना, और उस मौन में सदियों की आवाज़ें सुनाई दीं।
शाम को एक पुराना संस्मरण मिला जिसमें लिखा था, "इतिहास मृत नहीं है, वह हमारी सांसों में जीता है।" कितना सच है यह।
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