आज लालकुआं से चाँदनी चौक की तरफ़ निकला था — इरादा था कि बीच की गलियाँ नापूँगा, मेट्रो से नहीं, बस पैदल। पहली ही गली में एक बाईं तरफ़ का मोड़ ले लिया जो दाहिनी तरफ़ होना चाहिए था। नक्शा सही था, बस मैं उल्टा खड़ा था।
एक तीन-मंज़िला पीली इमारत के नीचे पुरानी दुकान थी — रामलाल एण्ड संस, इलेक्ट्रिकल मर्चेंट, स्था. 1971। "संस" वाला हिस्सा थोड़ा धुंधला पड़ गया था, जैसे संस ने दुकान कब का छोड़ दी हो। साइनबोर्ड का रंग वही पुराना नीला जो अब कहीं-कहीं ही मिलता है।
गली में एक ढकी नाली के ऊपर से गुज़रा। नीचे से पानी की आवाज़ आ रही थी, पर दिख कुछ नहीं रहा था। शहर का पानी इसी तरह बहता है — बिना दिखे, बिना शोर मचाए। ढक्कन पर पाँव रखा तो हल्की सी खड़खड़ाहट हुई।
आधे रास्ते पर एक थड़ी पर चाय रुककर ली। कुल्हड़ में आई — कड़वी और तीखी। पहला घूंट लेते ही मिट्टी की हल्की गंध नाक तक आई। दुकानदार ने देखा कि मैं कुल्हड़ को घुमा-फिराकर देख रहा हूँ जैसे कोई पुरानी चीज़ हो। उसने कुछ कहा नहीं, बस वापस काम में लग गया।
चाँदनी चौक मेट्रो पहुँचा तो ग़लत गेट से निकल आया। बाहर एक ऑटो वाला खड़ा था। पूछा — "भाई, मेन बाज़ार किधर?" उसने इशारा किया — ठीक उसी दिशा में जहाँ से मैं आया था। मतलब पूरा चक्कर काटकर वापस शुरुआत पर।
वापसी मेट्रो में हुई। एक लाइन नोट की — जो गली एक बार ग़लत मुड़ी, वो दुबारा ग़लत नहीं मुड़ती। सच है या नहीं, पक्का नहीं। पर लगता है सही है।
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