आज का इरादा था — चाँदनी चौक मेट्रो से निकलकर पुराने बाज़ार की तरफ़ पैदल, फिर नली-वाली गली होते हुए फ़तेहपुरी तक। नक़्शा दिमाग़ में था, मोबाइल जेब में। बाहर निकला तो ग़लत गेट से। भीड़ ने उधर धकेल दिया जिधर मैं जाना नहीं चाहता था। दस मिनट उसी चक्कर में गए।
किसी दुकान के बाहर एक पुरानी लकड़ी की पट्टिका लगी थी — "शर्मा इलेक्ट्रिकल्स, स्था. 1971" — पर दुकान में पंखे की बजाय जूते बिक रहे थे। बोर्ड किसी ने बदला नहीं, बस नीचे एक नया टेप किया हुआ काग़ज़ लगा दिया था जिस पर "चप्पल, सैंडल, बूट" लिखा था। दोनों साथ-साथ टिके हुए थे — पुराना ज़माना और नई ज़रूरत।
गली थोड़ी संकरी हुई तो ठेले और दीवार के बीच जगह बचाते चला। एक ढकी हुई नाली के ऊपर से गुज़रा — नाली ढकी थी पर बदबू से पता चल गया कि नीचे ज़िंदगी जारी है।
दोपहर बाद एक छोटी थड़ी पर रुका। एक कुल्हड़ में चाय मिली — इतनी कड़वी कि मुँह ने पहली घूँट पर विरोध दर्ज कराया। पर ठंडी हवा नहीं थी, धूप तेज़ थी, और कड़वाहट के बाद जो गर्माहट आई वो ठीक थी। दुकानदार से कुछ बोला नहीं, वो भी चुप रहे। अच्छा रहा।
फ़तेहपुरी तक पहुँचते-पहुँचते पैर ने एक बार इशारा किया कि "बस करो भाई।" सुन लिया। वापसी मेट्रो से। नोटबुक में बस एक लाइन लिखी — शर्मा इलेक्ट्रिकल्स की दुकान में अब जूते हैं।
#पैदल_डायरी #पुरानी_दिल्ली #गली_मोहल्ला #चाय_की_थड़ी