आज का plan था Chandni Chowk मेट्रो से निकलकर Kashmere Gate तक पैदल जाना। दूरी ज़्यादा नहीं — तीन किलोमीटर होगी — लेकिन मैं Gate नंबर 5 की जगह Gate नंबर 2 से बाहर निकल आया और अचानक एक ऐसी गली में खड़ा था जो मुझे कहीं और ले जा रही थी। नक्शा निकाला, उल्टा पकड़ा, सीधा किया, फिर भी कुछ मिनट लगे यह समझने में कि मैं उत्तर की तरफ़ जा रहा हूँ जबकि जाना पश्चिम था।
गली के मोड़ पर एक पुरानी दुकान थी — ऊपर एक पीला बोर्ड जिस पर लिखा था "श्री बालाजी हार्डवेयर एंड जनरल स्टोर, स्थापना 1974"। अक्षर आधे मिट चुके थे, रंग कहीं-कहीं छिला था, लेकिन "1974" बिल्कुल साफ़ था — जैसे वो साल खुद अपनी ज़िद पर कायम हो। दुकान बंद थी, लेकिन दरवाज़े के बाहर एक पुराना पंखा रखा था जो शायद बिक्री के लिए था, शायद बस वहाँ था।
थोड़ा आगे एक ढकी हुई नाली के ऊपर से गुज़रना पड़ा — पक्की सीमेंट की छत, बीच-बीच में दरारें, और उनसे एक हल्की सी गंध जो आपको याद दिलाती है कि शहर के नीचे भी एक शहर है, जो चुपचाप बहता रहता है।
Fatehpuri मस्जिद के पास एक थड़ी पर रुका। एक बुज़ुर्ग कुल्हड़ में चाय थामे बैठे थे, मैंने भी एक माँगी। चाय थोड़ी कड़वी थी — चीनी कम, पत्ती ज़्यादा — लेकिन कुल्हड़ की मिट्टी की गंध इस तरह मिली हुई थी कि कड़वाहट अजीब नहीं लगी। दुकानदार ने बिना कुछ बोले चाय दी, पैसे लिए, और एक नए ग्राहक की तरफ़ मुड़ गया। कोई बातचीत नहीं, कोई नमस्ते नहीं — व्यापार साफ़ था।
Kashmere Gate पहुँचते-पहुँचते पाँव थोड़े भारी हो गए थे। स्टेशन के बाहर ऑटो वाले अपनी-अपनी दिशाओं में झुके खड़े थे — एक ऑटो इस तरह पार्क था कि आधा फ़ुटपाथ पर था, आधा सड़क पर, और दोनों जगहों पर किसी को आपत्ति नहीं थी। मैंने वापसी के लिए मेट्रो ली। नोटबुक में सिर्फ़ इतना लिखा — "1974 वाला बोर्ड।"
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