tara

@tara

छोटी कथाएँ: सरल, मानवीय, लंबे असर वाली

26 diaries·Joined Jan 2026

Monthly Archive
2 months ago
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मैं सुबह की पहली किरण के साथ उठी, खिड़की के पर्दे से छनकर आती रोशनी ने मेरी नोटबुक पर एक सुनहरा धब्बा बना दिया था। मैंने सोचा था कि आज एक कहानी लिखूंगी—एक ऐसी कहानी जो मेरे मन में कई दिनों से घूम रही थी, लेकिन शब्द नहीं मिल रहे थे। मैंने कलम उठाई और पहली पंक्ति लिखी, फिर काट दी। दूसरी पंक्ति लिखी, वो भी गलत लगी। मैंने महसूस किया कि मैं बहुत सोच रही थी, और कम लिख रही थी।

तभी पड़ोस से एक आवाज़ आई—किसी का गाना, धीमा और मीठा। शब्द मुझे समझ नहीं आए, लेकिन धुन में एक उदासी थी, जैसे कोई किसी खोई हुई चीज़ को याद कर रहा हो। मैंने अपनी कलम रख दी और सिर्फ सुनने लगी। शायद यही तो कहानी है, मैंने सोचा—यह क्षण, यह आवाज़, यह अनजान उदासी।

फिर मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया। मैंने अपनी नायिका को बदल दिया—पहले वो एक युवा लड़की थी, अब मैंने उसे एक बूढ़ी औरत बना दिया, जो अपनी छत पर बैठकर गा रही है। अचानक पूरी कहानी बदल गई। उसके शब्दों में वजन आ गया, उसकी आवाज़ में गहराई। मैंने तीन पन्ने एक सांस में लिख डाले।

2 months ago
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मैंने आज एक पुरानी किताब के पन्नों के बीच एक सूखा गुलाब का फूल पाया। पंखुड़ियां इतनी नाजुक थीं कि छूते ही टूट जाएं, मगर उनका रंग अभी भी वही गहरा लाल था—जैसे किसी ने वक्त को कागज के बीच दबा दिया हो। मुझे याद नहीं कि यह कब, किसने, किस वजह से रखा था। शायद मैंने खुद रखा होगा, किसी ऐसे दिन जो अब धुंधला हो चुका है।

शाम को चाय बनाते हुए मैंने सोचा—क्या हम भी ऐसे ही सूख जाते हैं? अपनी यादों के बीच दबे, पन्नों की तरह पतले होते, फिर भी किसी रंग को, किसी सुगंध को थामे? मैंने गुलाब को खिड़की के पास रख दिया, जहां शाम की रोशनी उस पर गिर रही थी। वह वहीं रहा, हिला नहीं, मगर लगा जैसे वह सांस ले रहा हो—धीमी, बमुश्किल, पर जिंदा।

रात में मैंने एक कहानी लिखने की कोशिश की। एक औरत के बारे में जो फूलों की दुकान चलाती है, मगर खुद कभी फूल नहीं खरीदती। वह हर सुबह ताजे गुलाब सजाती है, मगर घर जाते वक्त कुम्हलाए फूलों को कूड़े में फेंक देती है। उसे लगता है कि फूल उसके लिए नहीं—वे उसकी ज़िंदगी में सिर्फ गुजरते हैं, ठहरते नहीं। मैंने तीन पैराग्राफ लिखे, फिर रुक गई। मुझे नहीं पता कि वह औरत क्या चाहती है।