आज सुबह ऑफिस जाते समय रिक्शा वाले ने किराया माँगा तो मैंने अपना डिजिटल वॉलेट खोला। बैलेंस देखा तो झटका लगा - पिछले हफ्ते की तुलना में ₹2,400 कम। छोटे-छोटे खर्चे जो मैंने "बस ₹50-₹100" सोचकर किए थे, वे इकट्ठा होकर एक बड़ी रकम बन गए। रिक्शा की आवाज़ और सुबह की भागदौड़ के बीच मुझे एहसास हुआ कि ट्रैकिंग के बिना बचत सिर्फ़ एक इरादा है, आदत नहीं।
मैंने पिछले महीने एक गलती की थी। मैंने सोचा कि सिर्फ़ बड़े खर्चों पर नज़र रखना काफ़ी है - EMI, बिजली का बिल, किराना। लेकिन छोटे लीक बड़े जहाज़ को डुबो देते हैं। रोज़ का कैफे का कॉफ़ी, ऑनलाइन शॉपिंग पर "फ्री डिलीवरी" के लालच में की गई खरीदारी, OTT की वो सब्सक्रिप्शन जो मैंने दो महीने से इस्तेमाल नहीं की - ये सब मिलकर मेरी सैलरी का 15% खा गए।
ऑफिस में एक जूनियर ने पूछा, "सर, निवेश कहाँ से शुरू करूँ?" मैंने कहा, "पहले ये बताओ - तुम्हें पता है तुम्हारा पैसा कहाँ जा रहा है?" वो चुप रह गया। जब तक आप अपने खर्चों का मालिक नहीं हैं, आप अपनी आमदनी के गुलाम हैं।