आज रविवार है, लेकिन यह सोचकर कि सप्ताहांत का मतलब आराम नहीं, बल्कि योजना बनाने का समय है, मैं सुबह छह बजे उठा। पिछले महीने की खर्च की डायरी देखते हुए एक बात समझ आई - हर शनिवार शाम कॉफी शॉप में 300 रुपये खर्च हो जाते हैं। छोटी रकम लगती है, लेकिन साल भर में यह 15,000 रुपये बन जाती है। यह एहसास अचानक नहीं हुआ, बल्कि तीन महीने तक हर खर्च को नोट करने के बाद आया।
मैंने एक प्रयोग किया। पिछले दो हफ्तों से घर पर कॉफी बना रहा हूँ - सस्ती नहीं, बल्कि अच्छी क्वालिटी की बीन्स से। एक किलो 800 रुपये की है, लेकिन महीने भर चलती है। स्वाद में फर्क? शायद थोड़ा कम "फैंसी", लेकिन सच कहूँ तो मुझे पता भी नहीं चलता। असली फर्क यह है कि मैं वही पैसा बचाकर एक ऑनलाइन कोर्स में लगा सकता हूँ जो मेरे करियर को आगे बढ़ा सकता है।
दोपहर में भाई ने फोन किया। उसने पूछा, "तुम इतना पैसे के पीछे क्यों पड़े रहते हो? ज़िंदगी का मज़ा कब लोगे?" मैंने उसे समझाया कि यह पैसे के पीछे भागना नहीं है। यह समझना है कि हर रुपये का एक काम है - चाहे वह आज का सुख हो या कल की सुरक्षा। मैंने उसे बताया कि मैं हर महीने 20% बचाता हूँ, लेकिन बाकी 80% में से जो खर्च करता हूँ, वह भी सोच-समझकर। वह चुप हो गया। शायद उसे लगा मैं उपदेश दे रहा हूँ, लेकिन मेरा मकसद सिर्फ यह था कि वह अपनी आदतों पर एक बार नज़र डाले।