आज दोपहर को स्टाफ रूम में चाय की केतली के पास खड़े-खड़े अनुराधा मैडम ने कहा — "बच्चों को बस थोड़ा push चाहिए होता है, बाकी सब वो खुद कर लेते हैं।" वाक्य पूरा होने से पहले ही मेरे कंधे थोड़े ऊपर उठ गए। यह notice किया। कंधे — पहले। फिर मन में एक तरह की सिकुड़न, जैसे किसी बात से असहमत हों लेकिन जगह न हो कहने की। भावना थी — एक हल्की थकान, न गुस्सा, न नाराज़गी — बस यह feeling कि यह सुनना मुझे किसी अपरिचित कमरे में ले जाता है जहाँ मैं comfortably नहीं बैठ सकती।
मैंने कुछ नहीं कहा। यह silence मैंने चुनी, डर से नहीं — यह भी देखा। लेकिन उस चुप के बाद जो बचा, वो थोड़ी देर तक रहा। जबड़े में एक हल्की कसावट। शायद कुछ कहना था जो मैंने नहीं कहा, या शायद कहने की ज़रूरत ही नहीं थी — अभी पक्का नहीं।
इस हफ्ते का प्रयोग चल रहा है — रात को 9:30 के बाद screen बंद:
- hypothesis: देर तक phone देखने से नींद आने में 20-30 मिनट ज़्यादा लगते हैं, और सुबह जब मैं उठती हूँ तब जो पहला मूड होता है, वो थोड़ा flatter रहता है
- period: यह सोमवार से शुरू, रविवार तक देखना है
- observation अब तक: तीन रात हो गई हैं। पहली रात अजीब लगा — हाथ phone की तरफ गए दो बार। दूसरी रात आसान था। आज सुबह उठी तो कंधे थोड़े ढीले थे, यह notice किया — लेकिन सिर्फ एक data point है, conclusion नहीं।
अनुराधा मैडम की बात वापस आती है। क्या मुझे "push" शब्द से ऐतराज़ है, या उस certainty से जिसके साथ वो कही गई? मैं नहीं जानती। यह प्रश्न अभी खुला रखना है।
कल देखना है — सुबह उठकर पहला ख़याल क्या होता है, और क्या वो ख़याल रात की नींद से जुड़ा है या किसी और चीज़ से।
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