आज सुबह पड़ोसी की बेटी की आवाज़ कान में पड़ी — वो अपनी माँ से कह रही थी, "तुम हमेशा मेरी बात काटती...
Private by default — share only the days you choose.
No comments yet. Be the first to comment!
Sign in to leave a comment.
आज सुबह पड़ोसी की बेटी की आवाज़ कान में पड़ी — वो अपनी माँ से कह रही थी, "तुम हमेशा मेरी बात काटती...
आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज सुबह जब माँ का फ़ोन आया — बस हाल-चाल पूछने वाला, दस मिनट का — तो मेरे कंधे पहले ही थोड़े चढ़ गए...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में मिसेज़ देशपांडे ने किसी से कहा — "बच्चों को बस थोड़ी ज़्यादा मेहनत चाहिए,...
आज स्टाफ रूम में रीना मैडम किसी से कह रही थीं — "बच्चे सुनते नहीं इसलिए घर बिगड़ता है।" मैं वहीं से...
आज दोपहर स्टाफ रूम में एक वाक्य कानों में पड़ा — "वो बच्चा बस attention चाहता है।" इतनी सफाई से कहा गया था, जैसे किसी ने एक फ़ाइल बंद की हो और मामला खत्म। मैं चुप रही। पर जाते वक्त देखा कि कंधे भारी हो गए थे — पहले शरीर ने कुछ दर्ज किया, विचार बाद में आया।
यह तीनों अलग करने की कोशिश करती हूँ अब: शरीर ने क्या कहा, मन ने क्या सोचा, और भावना क्या थी। कंधों में खिंचाव — यह शरीर था। फिर विचार: "क्या यह सरलीकरण नहीं है? एक बच्चे को एक वाक्य में रख देना?" और फिर कुछ और — गुस्सा नहीं, पर उससे मिलता-जुलता। शायद असहमति की एक चुप किस्म, जो बाहर नहीं निकली।
इस हफ्ते एक छोटा प्रयोग चल रहा है। रात नौ बजे के बाद फ़ोन बंद करना — देखना है कि नींद की गुणवत्ता बदलती है या नहीं, और सुबह का पहला एहसास उससे जुड़ा है कि नहीं।
परिकल्पना: स्क्रीन कम → नींद गहरी → सुबह हल्की।
अवधि: एक हफ्ता। आज चौथा दिन।
जाँच का तरीका: उठते वक्त पहला जो एहसास हो — उसे एक-दो शब्दों में नोट करना।
अब तक का डेटा:
एक सवाल अभी खुला रखती हूँ: क्या उस वाक्य से मुझे इसलिए तकलीफ हुई क्योंकि मैं उस बच्चे के बारे में और बात करना चाहती थी — या इसलिए कि कहीं मैंने खुद को भी ऐसे summarize होते देखा है?
कल की सुबह देखूँगी। यह भी देखना है कि रात का वो खालीपन — जो फ़ोन बंद होने के बाद आता है — क्या असली बेचैनी है, या बस आदत टूटने का शोर। अभी तय नहीं करना।
#आत्मचिंतन #छोटे_प्रयोग #मन_की_डायरी #शरीर_की_भाषा