आज सुबह जब माँ का फ़ोन आया — बस हाल-चाल पूछने वाला, दस मिनट का — तो मेरे कंधे पहले ही थोड़े चढ़ गए...
आज सुबह जब माँ का फ़ोन आया — बस हाल-चाल पूछने वाला, दस मिनट का — तो मेरे कंधे पहले ही थोड़े चढ़ गए...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में मिसेज़ देशपांडे ने किसी से कहा — "बच्चों को बस थोड़ी ज़्यादा मेहनत चाहिए,...
आज स्टाफ रूम में रीना मैडम किसी से कह रही थीं — "बच्चे सुनते नहीं इसलिए घर बिगड़ता है।" मैं वहीं से...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में चाय की केतली के पास खड़े-खड़े अनुराधा मैडम ने कहा — "बच्चों को बस थोड़ा...
आज स्टाफ रूम में रुक्मिणी मैडम ने कुछ नहीं कहा — बस एक pause था, जब मैंने Riya की बात बताई। वो...
आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला लगता है।" बात वहीं खत्म हो गई, पर मेरे भीतर कुछ ठहर गया। कंधों में एक हल्का खिंचाव था, सांस थोड़ी धीमी हो गई। थकान नहीं, पर कोई तारें कसी हुई-सी। विचार आया: क्या वो बच्चे के बारे में बोल रही थीं, या कहीं खुद के? और एक और विचार — शायद मैं भी यही महसूस करती हूँ कभी-कभी। पर वह भावना नहीं थी उस पल — सिर्फ एक पहचान थी, जो चुपचाप आई और चली गई।
घर आते हुए बस छूट गई। दस मिनट की प्रतीक्षा। शरीर ने उस देरी को बड़ा बना दिया — जबड़ा थोड़ा भिंचा, पेट में एक छोटी-सी उलझन। चिड़चिड़ाहट थी, पर किस पर? बस पर नहीं। शायद थकान पर। और फिर सोचा — यह थकान कल रात से आ रही है। देर तक जागी, बिना किसी ज़रूरी काम के, बस फोन हाथ में था।
इसी से जुड़ा एक प्रयोग पिछले हफ्ते शुरू किया:
परिकल्पना यह थी कि इससे सुबह का मूड थोड़ा स्थिर रहेगा, कंधों का वह खिंचाव कम होगा। आज तीसरा दिन है। पहले दो रातें बेहतर लगीं — सुबह उठने पर आँखों के पीछे की वह सुस्ती नहीं थी। पर कल भूल गई — फोन उठाया, फिर रखा, फिर उठाया। यह "भूलना" भी डेटा है, शायद। अभी मान लेती हूँ कि एक हफ्ते से पहले कुछ नहीं कहा जा सकता।
एक सवाल अभी घूम रहा है: क्या मैं नींद की कमी को बाहरी घटनाओं पर डालती हूँ?
अभी इस सवाल का जवाब नहीं देना। बस आज रात देखना है — नौ बजे फोन रखने के बाद उठाने की तलब आती है या नहीं, और उस तलब में क्या भाव होता है: ऊब, बेचैनी, या सिर्फ आदत।
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