आज दोपहर स्टाफ रूम में एक वाक्य कानों में पड़ा — "वो बच्चा बस attention चाहता है।" इतनी सफाई से कहा...
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आज दोपहर स्टाफ रूम में एक वाक्य कानों में पड़ा — "वो बच्चा बस attention चाहता है।" इतनी सफाई से कहा...
आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज सुबह जब माँ का फ़ोन आया — बस हाल-चाल पूछने वाला, दस मिनट का — तो मेरे कंधे पहले ही थोड़े चढ़ गए...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में मिसेज़ देशपांडे ने किसी से कहा — "बच्चों को बस थोड़ी ज़्यादा मेहनत चाहिए,...
आज स्टाफ रूम में रीना मैडम किसी से कह रही थीं — "बच्चे सुनते नहीं इसलिए घर बिगड़ता है।" मैं वहीं से...
आज सुबह पड़ोसी की बेटी की आवाज़ कान में पड़ी — वो अपनी माँ से कह रही थी, "तुम हमेशा मेरी बात काटती हो।" बस इतना। उनके दरवाज़े और मेरे बीच सिर्फ एक दीवार थी। कुछ देर रुकी रही, चाय पकड़े। कंधे पहले अकड़े — यह शरीर का संकेत था। फिर एक विचार आया: मैं भी तो कभी-कभी ऐसा करती हूँ। और उसके बाद जो आया, वो शर्म से ज़्यादा पहचान थी — एक धीमी, असुविधाजनक पहचान।
पिछले हफ्ते का प्रयोग जारी है — रात नौ बजे के बाद फ़ोन बंद। परिकल्पना यह थी कि स्क्रीन हटाने से नींद जल्दी आएगी। अभी तक का डेटा: सात में से पाँच रातें ठीक रहीं। दो रातें मन उसी समय ज़्यादा चलने लगा — शायद इसलिए कि फ़ोन न हो तो ध्यान भटकाने का बहाना नहीं बचता। यह दिलचस्प है। आसान होना और सफल होना एक नहीं है, यह भी देखना है।
जो बात उस बच्ची ने कही, वो एक सवाल तक पहुँची: क्या मैं किसी की बात पूरी सुन पाती हूँ, या बीच में ही जवाब बुनने लगती हूँ? काम पर सुनना अभ्यास का हिस्सा है। लेकिन घर पर — माँ के साथ, दीदी के साथ — वहाँ पक्का नहीं। जाँचने का तरीका अभी नहीं मिला।
आँखों के पीछे थकान है। जबड़ा थोड़ा भिंचा हुआ है। ये दोनों तब आते हैं जब मन कुछ तय नहीं कर पाता और उसे दबाने की कोशिश करता है। यह पैटर्न अब पहचान में आता है — पर पहचानना और बदलना दोनों अलग काम हैं, और अभी मैं सिर्फ पहले वाले पर हूँ।
इस हफ्ते एक बात देखूँगी: जब कोई बोल रहा हो और मेरे मन में जवाब आ जाए — उस पल में शरीर क्या करता है? साँस रुकती है? कंधे उठते हैं? बस इतना नोट करना है। कोई निर्णय नहीं अभी।
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