आज सुबह खिड़की के बाहर कौओं की आवाज़ सुनते हुए मुझे एहसास हुआ कि मैं कितनी जल्दी में थी। चाय बनाते समय भी मेरा मन अगले घंटे की योजनाओं में उलझा था। फिर अचानक चाय का पानी उबल कर गिर गया। उस छोटी सी गलती ने मुझे रोक दिया। मैंने सोचा - क्या मैं वाकई यहाँ हूँ, या सिर्फ अपने विचारों में भटक रही हूँ?
दोपहर में एक पुरानी किताब पढ़ते हुए एक पंक्ति पर ठहर गई: "मन एक बगीचा है, जिसमें हम जो बोते हैं, वही उगता है।" कितनी सरल बात है, फिर भी हम अक्सर भूल जाते हैं। हम अपने मन में चिंता, जल्दबाजी, और असंतोष के बीज बोते रहते हैं, फिर सोचते हैं कि शांति क्यों नहीं मिलती।
शाम को मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया। पाँच मिनट के लिए बस बैठ गई, बिना फ़ोन, बिना किताब। सिर्फ साँसों को देखा। पहले तो मन ने विरोध किया - "समय बर्बाद हो रहा है", "कुछ काम कर लो"। लेकिन मैं बैठी रही। धीरे-धीरे विचारों का शोर कम हुआ, और एक अजीब सी स्थिरता आई। सिर्फ पाँच मिनट में।
मैं सोचती हूँ - क्या हम अपने मन को जानने से डरते हैं? शायद इसीलिए हम हमेशा व्यस्त रहना चाहते हैं, कुछ न कुछ करते रहना चाहते हैं। ख़ामोशी में अपने आप से मिलना कभी-कभी असहज लगता है।
आज मैंने सीखा कि दर्शन किताबों में नहीं, छोटे-छोटे पलों में छिपा है। चाय के उबलने की आवाज़ में, साँसों की लय में, मन की बेचैनी को देखने में। जीवन हमें रोज़ सिखाता है, अगर हम थोड़ा रुककर देखें।
अगर आपके पास पाँच मिनट हों आज, तो बस बैठ जाइए। कुछ करने की ज़रूरत नहीं। सिर्फ अपनी साँसों को गिनिए - एक से पाँच तक। देखिए क्या होता है।
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