आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज सुबह जब माँ का फ़ोन आया — बस हाल-चाल पूछने वाला, दस मिनट का — तो मेरे कंधे पहले ही थोड़े चढ़ गए...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में मिसेज़ देशपांडे ने किसी से कहा — "बच्चों को बस थोड़ी ज़्यादा मेहनत चाहिए,...
आज स्टाफ रूम में रीना मैडम किसी से कह रही थीं — "बच्चे सुनते नहीं इसलिए घर बिगड़ता है।" मैं वहीं से...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में चाय की केतली के पास खड़े-खड़े अनुराधा मैडम ने कहा — "बच्चों को बस थोड़ा...
आज सुबह खिड़की के पास बैठे हुए मैंने देखा कि धूप किस तरह से पत्तों के बीच से छनकर फर्श पर नाच रही थी। हर पत्ता जैसे अपनी कहानी कह रहा हो - कुछ स्थिर, कुछ हवा में हल्के से हिलते हुए। मैंने सोचा, क्या हमारे विचार भी ऐसे ही नहीं होते? कुछ ठहरे हुए, कुछ आते-जाते।
पिछले हफ्ते मैंने अपनी डायरी में लिखा था कि मुझे ध्यान करना है हर रोज़। पर आज तक नियमित नहीं हो पाई। यह सोचकर थोड़ा बुरा लगा, पर फिर ख़याल आया - शायद समस्या यह नहीं कि मैं नियमित नहीं हूँ, बल्कि यह कि मैं "परफेक्ट" होने की कोशिश कर रही हूँ। जब मैंने खुद को यह अनुमति दी कि पाँच मिनट भी काफी हैं, तो मन हल्का हो गया।
दोपहर में बस स्टॉप पर एक बूढ़ी अम्मा को देखा। वे अपने पोते को समझा रही थीं, "बेटा, जल्दी क्या है? बस आएगी तो आएगी।" उनकी आवाज़ में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, बस एक शांत स्वीकृति। मैंने सोचा, मुझे भी यही सीखना है - जीवन के साथ बहना, उसे धक्का देना नहीं।
शाम को मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया। मैंने तय किया कि अगली बार जब भी मैं अधीर महसूस करूँ, तो तीन गहरी साँसें लूँगी और अपने पैरों को ज़मीन पर महसूस करूँगी। पहले तो अजीब लगा - क्या इतने से कुछ होगा? पर जब मैंने किया, तो शरीर में एक अलग ही स्थिरता आई।
क्या आप भी आज एक छोटा सा प्रयोग करना चाहेंगे? अगली बार जब आप पानी पिएं, तो सिर्फ़ पानी पीने पर ध्यान दें। फ़ोन नहीं, सोच नहीं - बस पानी का तापमान, गले से नीचे उतरने की अनुभूति। यह सिर्फ़ दस सेकंड का काम है, पर शायद कुछ नया दिखे।
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