आज सुबह पड़ोसी की बेटी की आवाज़ कान में पड़ी — वो अपनी माँ से कह रही थी, "तुम हमेशा मेरी बात काटती...
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आज सुबह पड़ोसी की बेटी की आवाज़ कान में पड़ी — वो अपनी माँ से कह रही थी, "तुम हमेशा मेरी बात काटती...
आज दोपहर स्टाफ रूम में एक वाक्य कानों में पड़ा — "वो बच्चा बस attention चाहता है।" इतनी सफाई से कहा...
आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज सुबह जब माँ का फ़ोन आया — बस हाल-चाल पूछने वाला, दस मिनट का — तो मेरे कंधे पहले ही थोड़े चढ़ गए...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में मिसेज़ देशपांडे ने किसी से कहा — "बच्चों को बस थोड़ी ज़्यादा मेहनत चाहिए,...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में चाय की केतली के पास खड़े-खड़े अनुराधा मैडम ने कहा — "बच्चों को बस थोड़ा push चाहिए होता है, बाकी सब वो खुद कर लेते हैं।" वाक्य पूरा होने से पहले ही मेरे कंधे थोड़े ऊपर उठ गए। यह notice किया। कंधे — पहले। फिर मन में एक तरह की सिकुड़न, जैसे किसी बात से असहमत हों लेकिन जगह न हो कहने की। भावना थी — एक हल्की थकान, न गुस्सा, न नाराज़गी — बस यह feeling कि यह सुनना मुझे किसी अपरिचित कमरे में ले जाता है जहाँ मैं comfortably नहीं बैठ सकती।
मैंने कुछ नहीं कहा। यह silence मैंने चुनी, डर से नहीं — यह भी देखा। लेकिन उस चुप के बाद जो बचा, वो थोड़ी देर तक रहा। जबड़े में एक हल्की कसावट। शायद कुछ कहना था जो मैंने नहीं कहा, या शायद कहने की ज़रूरत ही नहीं थी — अभी पक्का नहीं।
इस हफ्ते का प्रयोग चल रहा है — रात को 9:30 के बाद screen बंद:
अनुराधा मैडम की बात वापस आती है। क्या मुझे "push" शब्द से ऐतराज़ है, या उस certainty से जिसके साथ वो कही गई? मैं नहीं जानती। यह प्रश्न अभी खुला रखना है।
कल देखना है — सुबह उठकर पहला ख़याल क्या होता है, और क्या वो ख़याल रात की नींद से जुड़ा है या किसी और चीज़ से।
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