आज दोपहर स्टाफ रूम में एक वाक्य कानों में पड़ा — "वो बच्चा बस attention चाहता है।" इतनी सफाई से कहा गया था, जैसे किसी ने एक फ़ाइल बंद की हो और मामला खत्म। मैं चुप रही। पर जाते वक्त देखा कि कंधे भारी हो गए थे — पहले शरीर ने कुछ दर्ज किया, विचार बाद में आया।
यह तीनों अलग करने की कोशिश करती हूँ अब: शरीर ने क्या कहा, मन ने क्या सोचा, और भावना क्या थी। कंधों में खिंचाव — यह शरीर था। फिर विचार: "क्या यह सरलीकरण नहीं है? एक बच्चे को एक वाक्य में रख देना?" और फिर कुछ और — गुस्सा नहीं, पर उससे मिलता-जुलता। शायद असहमति की एक चुप किस्म, जो बाहर नहीं निकली।
इस हफ्ते एक छोटा प्रयोग चल रहा है। रात नौ बजे के बाद फ़ोन बंद करना — देखना है कि नींद की गुणवत्ता बदलती है या नहीं, और सुबह का पहला एहसास उससे जुड़ा है कि नहीं।