आज सुबह पड़ोसी की बेटी की आवाज़ कान में पड़ी — वो अपनी माँ से कह रही थी, "तुम हमेशा मेरी बात काटती हो।" बस इतना। उनके दरवाज़े और मेरे बीच सिर्फ एक दीवार थी। कुछ देर रुकी रही, चाय पकड़े। कंधे पहले अकड़े — यह शरीर का संकेत था। फिर एक विचार आया: मैं भी तो कभी-कभी ऐसा करती हूँ। और उसके बाद जो आया, वो शर्म से ज़्यादा पहचान थी — एक धीमी, असुविधाजनक पहचान।
पिछले हफ्ते का प्रयोग जारी है — रात नौ बजे के बाद फ़ोन बंद। परिकल्पना यह थी कि स्क्रीन हटाने से नींद जल्दी आएगी। अभी तक का डेटा: सात में से पाँच रातें ठीक रहीं। दो रातें मन उसी समय ज़्यादा चलने लगा — शायद इसलिए कि फ़ोन न हो तो ध्यान भटकाने का बहाना नहीं बचता। यह दिलचस्प है। आसान होना और सफल होना एक नहीं है, यह भी देखना है।
जो बात उस बच्ची ने कही, वो एक सवाल तक पहुँची: क्या मैं किसी की बात पूरी सुन पाती हूँ, या बीच में ही जवाब बुनने लगती हूँ? काम पर सुनना अभ्यास का हिस्सा है। लेकिन घर पर — माँ के साथ, दीदी के साथ — वहाँ पक्का नहीं। जाँचने का तरीका अभी नहीं मिला।