आज सुबह कड़ाही में तेल गरम होते वक्त जो धुआँ उठा, उसमें सरसों के तेल की जानी-पहचानी गंध थी — थोड़ी...
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आज सुबह कड़ाही में तेल गरम होते वक्त जो धुआँ उठा, उसमें सरसों के तेल की जानी-पहचानी गंध थी — थोड़ी...
आज सुबह देर तक कड़ाही में पानी खदबदाता रहा — मैंने गैस धीमी नहीं की, बस वैसे ही छोड़ दिया और चाय...
कड़ाही में जीरा डाला तो छनकने की जगह धुआँ उठा — तेल ज़्यादा गरम हो गया था। जल्दी से आँच कम की, पर...
कड़ाही में तेल की लकीर अभी भी थरथरा रही थी जब मैंने जीरा डाला — वो छनकार, फिर एक पल की चुप्पी, फिर...
Most of us have felt it: you finally sit down to rest, and within minutes you're scrolling,...
आज सुबह रसोई में कदम रखते ही हल्दी और जीरे की महक ने मुझे अपनी दादी की रसोई में वापस पहुंचा दिया। शनिवार की सुबह का मतलब होता था घर में कुछ खास बनाना। मैंने सोचा था आज दाल बाटी चूरमा बनाऊंगी, लेकिन आटे में घी की मात्रा का अंदाजा गलत हो गया। पहली बाटी थोड़ी ज्यादा सख्त बन गई।
माँ ने हमेशा कहा था कि आटा गूंधते समय हाथों से महसूस करो, तराजू से नहीं नापो। लेकिन आज मैंने जल्दबाजी में वो बात भूल गई। दूसरी बार जब मैंने आटे को धीरे-धीरे गूंधा, उसकी नरम बनावट को उंगलियों से परखा, तब जाकर वो सही मुलायम बाटी बनी। यही तो है खाना बनाने का असली हुनर - धैर्य और अहसास।
बाटी को तंदूर में रखने से पहले उसकी सुनहरी परत देखकर दिल खुश हो गया। जब वो पकने लगी तो पूरे घर में गेहूं और घी की भीनी-भीनी खुशबू फैल गई। एक पड़ोसी ने दरवाजे पर आकर पूछा, "क्या बना रही हो? महक तो बहुत अच्छी आ रही है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "आज राजस्थान घर आ गया है।"
दाल में मैंने ये चीजें डालीं:
चूरमे की मिठास और दाल की खट्टी-मीठी गरमाई के साथ जब गरमागरम बाटी तोड़ी, तो हर निवाला एक अलग कहानी सुना रहा था। दादी कहती थीं, "जो खाना प्यार से बनाया जाए, वो सबसे ज्यादा स्वादिष्ट होता है।" आज उनकी ये बात सच लगी।
खाने के बाद वो संतोष का एहसास, जो सिर्फ घर के बने खाने से मिलता है, वो अलग ही था। शाम को मैंने बची हुई बाटी को अचार के साथ चाय में डुबोकर खाया - एक छोटा सा प्रयोग जो बचपन से करती आई हूँ।
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