आज सुबह बाज़ार से ताज़ी हरी धनिया और पुदीने की गंध के साथ लौटी। सब्ज़ी वाले ने मुस्कुराते हुए कहा, "आज की धनिया बहुत ताज़ी है, बीबीजी।" मैंने एक गुच्छा उठाकर सूंघा—वह तीखी, हरी, ज़िंदा खुशबू जो हर बार मुझे नानी के आँगन की याद दिला देती है।
घर पहुँचकर मैंने धनिया-पुदीना चटनी बनाने का फ़ैसला किया। सिल-बट्टे पर धनिया की पत्तियाँ, हरी मिर्च, लहसुन की दो कलियाँ, और नमक। पत्थर पर पीसते हुए वह कर्कश आवाज़ और धीरे-धीरे उभरती गाढ़ी हरी चटनी—हर बार यह एक ध्यान की तरह लगता है। मिक्सर में दो मिनट का काम, लेकिन आज मन था कि हाथ से पीसूँ।
पहली चखने पर तीखापन ज़बान पर छा गया, फिर धनिये की मिट्टी जैसी गहराई और आख़िर में नींबू की खट्टास ने सब कुछ संतुलित कर दिया। मैंने थोड़ा भुना जीरा मिलाया—बस, वही लापता परत मिल गई।
नानी हमेशा कहती थीं, "चटनी में जीरा न हो, तो वह अधूरी है।" उनकी आवाज़ अब भी कानों में गूँजती है जब भी मैं रसोई में खड़ी होती हूँ। उन्होंने मुझे सिखाया था कि खाना सिर्फ़ पेट भरने के लिए नहीं—यह याद, जड़, और प्यार की भाषा है।
शाम को इस चटनी के साथ आलू के पराठे खाए। गरम घी में तले पराठों की परत-दर-परत कुरकुराहट, बीच में मसालेदार आलू की नरम भराई, और ऊपर से यह हरी चटनी—हर निवाला एक पूरी कहानी बन गया। खाने के बाद उँगलियों पर लगी घी की चिकनाई और मुँह में बची धनिये की महक ने दिन को पूरा किया।
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