आज सुबह खिड़की से आती धूप में एक अजीब सा नारंगी रंग था—शायद धुंध की वजह से, या शायद मार्च की इस धूप में कुछ खास ही है। मैं अपनी कॉफी के साथ बैठा था और एक पुरानी किताब में छपे मुगल लघु-चित्रों को देख रहा था। हर बार जब मैं उन्हें देखता हूँ, मुझे आश्चर्य होता है कि इतने छोटे कैनवास में इतना जीवन कैसे समा जाता है।
दोपहर में मैंने एक प्रयोग किया। मैंने सोचा, क्या होगा अगर मैं अपने स्केचबुक में केवल छाया बनाऊं, वस्तुएं नहीं? तो मैंने अपनी मेज पर रखे गिलास, किताबों और पौधे की छाया को कागज़ पर उतारा। पहली कोशिश में रेखाएं बेजान लग रहीं थीं, लेकिन फिर मुझे समझ आया—छाया केवल अंधेरा नहीं है, वो एक आकार है जो रोशनी की अनुपस्थिति से बनता है। जो नहीं है, वो भी कुछ कहता है।
शाम को मैं बाज़ार गया। वहां एक बुजुर्ग कलाकार सड़क के किनारे बैठे थे, छोटे-छोटे मिट्टी के दीये बना रहे थे। मैं रुक गया और देखने लगा। उनकी उंगलियां इतनी तेज़ी से चल रहीं थीं कि मिट्टी खुद-ब-खुद आकार ले रही थी। मैंने पूछा, "आप इतने सालों से यही काम कर रहे हैं, क्या कभी बोरियत नहीं होती?" उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, हर दीया अलग होता है। मिट्टी हर बार कुछ नया सिखाती है।"
उनकी बात मेरे साथ चलती रही। मुझे लगा कि यही तो कला का सार है—दोहराव में भी नयापन खोजना। चाहे वो मुगल चित्रकार हों जो हर बार एक ही राग में नई धुन ढूंढते थे, या ये दीये बनाने वाले कलाकार। शायद मेरा छाया वाला प्रयोग भी इसी यात्रा का हिस्सा है।
रात को मैं फिर से उन स्केचेज़ को देख रहा था। वे अब भी अधूरे हैं, लेकिन उनमें कुछ है जो मुझे खींचता है। शायद यही बात मेरे साथ रहेगी—कि कभी-कभी जो अधूरा है, वो पूर्ण से ज़्यादा सच्चा होता है।
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