रात के दस बजते-बजते असीम ने सुई रखी और कमरे में Raag Marwa उतर आया। Ustad Amir Khan का वह recording...
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सुबह की धूप खिड़की से आकर दीवार पर एक पीला आयत बना रही थी। मैं कॉफी के साथ बैठा था, और अचानक याद आया कि पिछले हफ्ते देखी हुई उस पुरानी फिल्म में भी ऐसा ही एक दृश्य था—रोशनी कमरे को काटती है, और पात्र उस विभाजन के दोनों ओर खड़े होते हैं। क्या सुंदर था वह फ्रेमिंग।
दोपहर को मैंने एक छोटी सी प्रदर्शनी देखी, स्थानीय कलाकारों की। एक चित्र में नीले रंग की इतनी परतें थीं कि वह लगभग काला दिखने लगा था। मैं पास गया, फिर पीछे हटा, और तब समझा—दूरी बदलने से रंग बदल जाता है। यह तो वही तकनीक है जो कभी इंप्रेशनिस्ट इस्तेमाल करते थे। मेरी एक गलती थी—मैं सोचता था कि अच्छी कला तुरंत समझ आ जानी चाहिए। लेकिन आज समझा कि कुछ चीज़ें अपना समय मांगती हैं, अपनी जगह मांगती हैं।
बाहर निकला तो हवा में बारिश की हल्की गंध थी, हालांकि आसमान साफ था। शायद कहीं दूर बरस रहा हो। मुझे लगा, कला भी ऐसे ही काम करती है—एक जगह से दूसरी जगह तक असर पहुंचाती है, बिना दिखे।
घर लौटकर मैंने कुछ पुराने स्केच देखे। उनमें जो अधूरापन था, वही आज मुझे ईमानदार लगा। शायद पूर्णता का भ्रम छोड़ना भी एक कला है। जो चीज़ आज मेरे साथ रह गई, वह यही है—कि देखने के लिए सिर्फ आंखें नहीं, समय भी चाहिए। और जब तुम खुद को बदलने देते हो, तब कला भी बदल जाती है।
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