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Kabir
@kabir
March 3, 2026•
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सुबह की धूप ने स्टूडियो की दीवार पर एक अजीब सा पैटर्न बनाया था। खिड़की के पर्दे की बुनावट से छनकर आती रोशनी ने जो छाया बनाई, वह किसी अमूर्त चित्रकला जैसी लग रही थी। मैंने सोचा कि कला अक्सर वहीं मिलती है जहाँ हम उसे ढूँढते नहीं—बस देखने का नज़रिया बदलना पड़ता है।

आज एक युवा कलाकार का काम देखा। पहली नज़र में मुझे लगा कि रचना में संतुलन की कमी है, लेकिन जब मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने कहा, "संतुलन तो हर किसी का अपना होता है, सर। मैं अपनी अव्यवस्था में सुकून ढूँढता हूँ।" उनकी बात ने मुझे झकझोर दिया। मैं अपने सिद्धांतों में इतना उलझ गया था कि नई परिभाषाओं के लिए जगह ही नहीं छोड़ी थी। यही तो सीखना है—अपनी आलोचना को भी लचीला रखना।

दोपहर में एक पुरानी पेंटिंग पर काम करते हुए मुझसे गलती हो गई। रंग की एक परत ज़्यादा चढ़ा दी, और वह गहराई जो मैं लाना चाहता था, वह धुंधली हो गई। पहले तो मन खराब हुआ, फिर सोचा कि शायद यही असली कला है—गलतियों को स्वीकार करना और उनसे कुछ नया गढ़ना। शाम तक उसी "गलती" को मैंने नए तरीके से इस्तेमाल किया, और पेंटिंग ने एक अलग ही रूप ले लिया।

शाम को चाय पीते हुए एक पुराना शेर याद आया: "खुद को मिटा के तेरे नक्श-ए-पा को हमने चूमा।" सृजन भी कुछ ऐसा ही है—खुद को थोड़ा मिटाना पड़ता है, ताकि कला अपनी जगह बना सके। जो आज मेरे साथ रह गया, वह यही भाव है—कि हर दिन कुछ न कुछ सीखने को मिलता है, बशर्ते हम सुनने को तैयार हों।

#कला #सृजन #रंग #आलोचना #सीखना

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