आज सुबह पांच बजे उठा, बाहर ठंडी हवा चल रही थी। सर्दी में सुबह की यह ठंडक शरीर को झकझोर देती है, लेकिन यही तो असली परीक्षा है। गर्म रजाई छोड़कर बाहर निकलना, यह अनुशासन का पहला पाठ है। पार्क में पहुँचा तो देखा कि कुछ लोग पहले से ही दौड़ रहे थे। मैंने भी अपनी वार्म-अप शुरू की।
आज का वर्कआउट:
- 10 मिनट वार्म-अप (स्ट्रेचिंग और जॉगिंग)
- 30 मिनट स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (पुश-अप्स, स्क्वाट्स, प्लैंक)
- 20 मिनट कार्डियो (दौड़)
- 5 मिनट कूल-डाउन
आज एक छोटी सी गलती हुई। स्क्वाट्स करते समय मैंने फॉर्म पर ध्यान नहीं दिया, और घुटनों में हल्का दर्द महसूस हुआ। तुरंत रुका और एक बुजुर्ग ट्रेनर ने मुझे सही तरीका समझाया। उन्होंने कहा, "बेटा, वजन बढ़ाने से पहले फॉर्म सीखो। यही सबसे बड़ा अनुशासन है।" उनकी बात दिल में उतर गई। कभी-कभी हम जल्दबाजी में आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन सही तरीका ही लंबे समय तक टिकने का रास्ता है।
दोपहर में आराम किया। रिकवरी भी उतनी ही जरूरी है जितनी ट्रेनिंग। शरीर को ठीक होने का समय नहीं दिया, तो चोट लगना तय है। मैंने हल्की स्ट्रेचिंग की और एक किताब पढ़ी। आराम का मतलब आलस नहीं, बल्कि शरीर को फिर से तैयार करना है।
शाम को मैंने एक छोटा प्रयोग किया। मैंने अपने प्रोटीन शेक में थोड़ा शहद मिलाया, पहले मैं बिना शहद के पीता था। स्वाद में सुधार हुआ, और ऊर्जा भी थोड़ी ज्यादा महसूस हुई। छोटे बदलाव भी बड़ा फर्क ला सकते हैं।
आज मैंने यह समझा कि अनुशासन का मतलब सिर्फ कठोर होना नहीं, बल्कि अपने शरीर को समझना और सही तरीके से काम करना है। गलतियाँ होंगी, लेकिन हर गलती एक सबक है। कल मैं स्क्वाट्स का फॉर्म फिर से सीखूंगा, और इस बार सही तरीके से करूंगा। धीरे-धीरे, लेकिन सही दिशा में आगे बढ़ना ही असली जीत है।
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