आज दोपहर दो बजे ऑफिस से निकला। HITEC City में मई की धूप ऐसी थी जैसे हवा ख़ुद जल रही हो। Kondapur जाने वाली सड़क पर कोई पाँच सौ मीटर दूर — asphalt पर पानी की चमक दिखी। मैंने सोचा शायद रात को बारिश हुई होगी। पर क़दम बढ़ाया तो वह चमक भी आगे सरकती रही। वहाँ पहुँचा — सड़क बिल्कुल सूखी थी।
एक वाक्य में सवाल: गर्म सड़क पर पानी जैसी चमक क्यों दिखती है जबकि वहाँ कुछ भी नहीं होता?
observed fact: asphalt मई की दोपहर में 55-60°C तक गर्म हो जाती है। इसके ठीक ऊपर — ज़मीन से एक-दो मीटर तक — हवा की एक पतली परत बहुत गर्म होती है, जबकि कुछ मीटर ऊपर तापमान 42-44°C के आसपास रहता है। कुछ ही मीटर में 15°C का gradient — यह meteorology की standard textbook में दिया हुआ है।
widely accepted theory: गर्म हवा का घनत्व कम होता है → refractive index — अपवर्तनांक — भी थोड़ा कम → उसमें प्रकाश की गति थोड़ी ज़्यादा। जब आकाश से रोशनी इस gradient में तिरछे कोण से गुज़रती है, तो refraction — अपवर्तन — से धीरे-धीरे मुड़ती है। एक critical angle पर total internal reflection हो जाती है — पूर्ण आंतरिक परावर्तन। रोशनी नीचे जाने की बजाय वापस ऊपर उछल आती है। आँख को लगता है रोशनी नीचे से आ रही है — नीला आकाश ज़मीन पर दिखता है, पानी जैसा।
back-of-the-envelope: refractive index में बदलाव लगभग 10⁻⁴ के order में — बहुत छोटा, पर critical angle के पास काफ़ी। मेरा inference — नापा नहीं, सिर्फ़ reasoning है — यह है कि asphalt पर यह effect खेत की मिट्टी से ज़्यादा तेज़ होती है क्योंकि asphalt की specific heat कम होती है और वह जल्दी गर्म होती है। पर यह मैंने verify नहीं किया, अभी अनुमान ही है।
शाम को एक colleague से ज़िक्र किया। उसने पूछा — "मरुस्थल की मृग-मरीचिका भी यही है?" हाँ, same physics — बस वहाँ gradient ज़्यादा लंबा होता है, इसलिए illusion दूर तक दिखती है। इस phenomenon का नाम inferior mirage है। "मरीचिका" शब्द हिंदी में पहले से मौजूद था — physics ने बस उसे confirm किया।
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