आज सुबह ऑफिस निकलने से पहले छत का पंखा बंद किया। नज़र पंखुड़ियों पर गई — अगले किनारे पर धूल की एक साफ़, एकसमान परत जमी थी। पंखा तो रोज़ रात और दोपहर को घंटों चलता है; धूल टिकती कैसे है? यह सवाल दोपहर के खाने तक दिमाग में घूमता रहा।
पहले observation को सही से दर्ज करते हैं: धूल पंखुड़ी की ऊपरी सतह पर ज़्यादा है, नीचे की सतह काफी साफ़ है। सबसे मोटी परत leading edge पर है — वह किनारा जो हवा को पहले काटता है। यह उल्टा लगता है। तेज़ हवा को धूल उड़ानी चाहिए, जमानी नहीं।
जवाब fluid mechanics की एक बुनियादी अवधारणा में है: boundary layer। जब कोई ठोस सतह किसी fluid में चलती है, तो उस सतह के ठीक पास fluid की एक पतली परत होती है जो सतह के साथ "चिपकी" चलती है। इस परत में, सतह के बिल्कुल पास, fluid की गति शून्य होती है — और बाहर की ओर बढ़ती जाती है। यह कोई approximation नहीं; यह no-slip condition है, viscous fluids की बुनियाद।
एक अनुमान लगाते हैं:
- घरेलू पंखे की tip speed लगभग 5–8 m/s होती है।
- इस speed पर पंखुड़ी के ऊपर boundary layer की मोटाई लगभग 1–2 millimetre के order में होती है।
- धूल के कण 1–10 micrometre आकार के होते हैं — यानी boundary layer की मोटाई से सैकड़ों गुना छोटे।
ये कण उस शांत zone में आकर settle हो जाते हैं। बाहर की तेज़ हवा boundary layer को पार नहीं करती। समय के साथ, कण के ऊपर कण, परत मोटी होती जाती है।
एक और संभव factor है electrostatic attraction — plastic या धातु की सतह घूमते-घूमते हल्का static charge ले सकती है, और धूल के कण भी अक्सर charged होते हैं। यह force बहुत छोटी है, पर धूल का mass भी बहुत कम होता है। यहाँ मैं पक्का नहीं कह सकता कि कौन सा effect dominant है; material, humidity और RPM सब matter करते हैं। यह एक honest "नहीं पता" है।
इतना कहा जा सकता है: तेज़ घूमती पंखुड़ी भी अपनी सतह के पास एक शांत हवा का आवरण बनाए रखती है। धूल वहीं बैठती है जहाँ हवा रुकी हो। यह counterintuitive है, पर यही fluid mechanics का स्वभाव है।
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