आज का लक्ष्य था आज़ादपुर मेट्रो से मॉडल टाउन तक पैदल चलना। दोनों एक ही पीली लाइन पर हैं, एक स्टेशन...
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आज का लक्ष्य था आज़ादपुर मेट्रो से मॉडल टाउन तक पैदल चलना। दोनों एक ही पीली लाइन पर हैं, एक स्टेशन...
आज का इरादा था कि कश्मीरी गेट से लाल क़िला तक पैदल जाऊँगा — मेट्रो वाली लाइन के नीचे-नीचे, सड़क...
आज सोचा था कि Jama Masjid के गेट नंबर एक से निकलूँगा और Chawri Bazar मेट्रो तक पैदल जाऊँगा। सात-आठ...
आज का इरादा था — Lal Qila मेट्रो से Delhi Gate तक पैदल, सीधी सड़क, बहुत दूर नहीं। पर गेट से निकलते...
आज का इरादा था — चाँदनी चौक मेट्रो से निकलकर पुराने बाज़ार की तरफ़ पैदल, फिर नली-वाली गली होते हुए...
आज का इरादा था कि चाँदनी चौक मेट्रो से चलते हुए लाल किले की तरफ़ वाली सड़क तक पहुँचूँगा — सीधी लाइन, कोई भटकाव नहीं। लेकिन निकला D गेट से, जो असल में C गेट की तरफ़ मुँह किए खड़ा था, और यह तब समझ आया जब पाँच मिनट उल्टी दिशा में चल चुका था। गूगल मैप खुला था, उल्टा नहीं था इस बार — बस मैं ख़ुद ही उल्टे मुँह था।
मुख्य सड़क छोड़कर एक पतली गली में घुस गया जहाँ ढकी हुई नाली के ऊपर एक पुराना साइनबोर्ड टँगा था — "श्री बालाजी जनरल स्टोर, स्थापना १९५७।" रंग उखड़ा हुआ, अक्षरों में से कुछ सफ़ेद, कुछ पीले। जो चीज़ अटकी वो यह थी कि नीचे छोटे हर्फ़ों में लिखा था: "मिलिट्री राशन भी मिलता है।" शायद किसी और ज़माने की पंक्ति, अब सिर्फ़ दीवार की याद।
नाली के किनारे पैर रखते हुए एक संकरे मोड़ पर दाईं तरफ़ मुड़ा। वहाँ एक छोटी सी थड़ी थी — एक बुज़ुर्ग गैस चूल्हे पर चाय बना रहे थे। कुल्हड़ माँगा, उन्होंने दिया। चाय में वो कड़वाहट थी जो शायद अदरक की नहीं, बल्कि पत्ती के ज़्यादा देर उबलने की थी। कुल्हड़ की मिट्टी की गंध ऊपर से आती रही, जो उस कड़वाहट को थोड़ा माफ़ करती रही। मैंने नमस्ते बोला, उन्होंने हल्का सा सिर हिला दिया — न ज़्यादा, न कम।
वहाँ से एक धीरे-धीरे उतरती ढलान मिली — इतनी धीरे कि पहले पैरों को पता चला, आँखों को बाद में। नीचे एक फ़ुटओवर ब्रिज था जिसकी नामपट्टी टेढ़ी हो गई थी, तो पूरा नाम पढ़ नहीं पाया। एक ऑटो किनारे तिरछा खड़ा था, जैसे ख़ुद भी थोड़ा थका हुआ हो। बाज़ार के इस पश्चिमी छोर पर दोपहर बाद की रौनक हल्की थी — दुकानदार बैठे थे, ग्राहक कम थे, कहीं दूर से अज़ान की आवाज़ आ रही थी।
वापसी मेट्रो से। सोचा था एक लाइन का नोट लिखूँगा, लिखा यह: "पुराना साइनबोर्ड कभी-कभी उस दुकान से ज़्यादा जानता है जो उसके नीचे बैठी है।"
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