आज सोचा था कि Jama Masjid के गेट नंबर एक से निकलूँगा और Chawri Bazar मेट्रो तक पैदल जाऊँगा। सात-आठ...
आज सोचा था कि Jama Masjid के गेट नंबर एक से निकलूँगा और Chawri Bazar मेट्रो तक पैदल जाऊँगा। सात-आठ...
आज का इरादा था — Lal Qila मेट्रो से Delhi Gate तक पैदल, सीधी सड़क, बहुत दूर नहीं। पर गेट से निकलते...
आज का इरादा था — चाँदनी चौक मेट्रो से निकलकर पुराने बाज़ार की तरफ़ पैदल, फिर नली-वाली गली होते हुए...
आज का plan था Chandni Chowk मेट्रो से निकलकर Kashmere Gate तक पैदल जाना। दूरी ज़्यादा नहीं — तीन...
आज का इरादा था — लाल किला मेट्रो से चाँदनी चौक तक पैदल, बीच में जो भी आए। दूरी ज़्यादा नहीं, शायद...
आज का इरादा था कि कश्मीरी गेट से लाल क़िला तक पैदल जाऊँगा — मेट्रो वाली लाइन के नीचे-नीचे, सड़क पकड़कर। नक्शे पर दूरी डेढ़ किलोमीटर दिखती है, लेकिन रास्ते में जितनी गलियाँ हैं उन्हें गिनो तो शायद पाँच हो जाती है।
कश्मीरी गेट स्टेशन के गेट नंबर चार से निकला — या जो मुझे चार लगा, दरअसल वो दो था। ये जानकारी तब हुई जब सामने की सड़क पर ट्रैफ़िक उल्टा बह रहा था। फ़ोन निकाला, मैप खोला, और तीन मिनट तक उसे उल्टा पकड़े रहा — जब तक एक ऑटो वाले ने खिड़की से सिर निकालकर पूछा, "भाई, कहाँ जाना है?" मुझे ख़ुद ठीक से पता नहीं था, तो बस मुस्कुराकर निकल गया।
थोड़ा आगे चला तो एक पुरानी दुकान दिखी — लकड़ी के बोर्ड पर पेंट से लिखा "रामलाल एंड संस — बरतन, चाय, राशन।" तीनों का कोई आपसी रिश्ता नहीं लगा, लेकिन दुकान खुली थी तो शायद काम चल रहा होगा। बोर्ड का रंग कुछ इस तरह उड़ा हुआ था कि 'एंड' का 'ए' लगभग गायब था — अब वो "रामलाल & संस" जैसा दिखता था, जो शायद ज़्यादा आधुनिक है। मुझे वो फेडेड 'ए' ज़्यादा पसंद था।
एक ढके हुए नाले के किनारे एक चाय वाले की थड़ी थी — छोटी, दो कप और एक केतली। चाय माँगी। कुल्हड़ में आई — मिट्टी की गंध पहले, चाय बाद में। एक घूँट लिया तो थोड़ी कड़वी थी, शायद देर से पकी थी। लेकिन उसी कड़वाहट में कुछ था जो ठीक लगा — जैसे शहर ने कहा हो कि ज़्यादा उम्मीद मत रख, बस चलते रहो।
लाल क़िला जब दिखा तो दीवार पर धूप तिरछी पड़ रही थी। मैंने सोचा था कि कोई गहरी बात लिखूँगा नोटबुक में। पर क़लम उठाई तो लिखा सिर्फ़ इतना: "गेट दो था, चार नहीं। चाय ठीक थी।"
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