आज सोमवार था, और सोमवार को चलना ज़्यादा ज़रूरी लगता है — बाकी दुनिया दफ़्तर की तरफ़ भागती है, मैं...
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आज सोमवार था, और सोमवार को चलना ज़्यादा ज़रूरी लगता है — बाकी दुनिया दफ़्तर की तरफ़ भागती है, मैं...
आज रविवार था। इरादा था कश्मीरी गेट मेट्रो से निकलकर यमुना की तरफ़ वाले रास्ते पर चलना — नदी देखनी...
आज का लक्ष्य था आज़ादपुर मेट्रो से मॉडल टाउन तक पैदल चलना। दोनों एक ही पीली लाइन पर हैं, एक स्टेशन...
आज का इरादा था कि चाँदनी चौक मेट्रो से चलते हुए लाल किले की तरफ़ वाली सड़क तक पहुँचूँगा — सीधी...
आज का इरादा था कि कश्मीरी गेट से लाल क़िला तक पैदल जाऊँगा — मेट्रो वाली लाइन के नीचे-नीचे, सड़क...
आज बुधवार था और बुधवार को पैदल चलने का कोई तुक नहीं है — यही सोचकर सुबह दस बजे सीलमपुर मेट्रो से निकला। इरादा था शास्त्री पार्क तक जाना, रेड लाइन पर दो स्टेशन, ज़मीन पर शायद तीन-साढ़े तीन किलोमीटर।
नंबर तीन गेट से निकला। बाईं तरफ़ चला, फिर दाईं तरफ़ मुड़ा, फिर खड़े होकर सोचा। फ़ोन निकाला, उत्तर ढूँढने की कोशिश की। फ़ोन ने बताया कि मैं सही दिशा में हूँ। थोड़ी देर बाद उसने राय बदली। मैंने तय किया कि हम दोनों में से जो भी सही हो, रास्ता यहीं से होकर जाता है।
एक संकरी गली में दाखिल हुआ जहाँ एक पुरानी दीवार पर टिन का साइनबोर्ड लगा था — "गुप्ता इलेक्ट्रिकल वर्क्स, स्थापना १९७३।" सफ़ेद पर नीला रंग, नीले में से कुछ छिल गया था। दुकान बंद थी पर अंदर से किसी टीवी की आवाज़ आ रही थी। शायद मालिक था, शायद पड़ोसी।
आगे एक चाय-थड़ी पर रुका। कुल्हड़ में चाय माँगी। चाय ज़्यादा मीठी थी, मैंने कम मीठी माँगी थी — पर दुकानदार ने जिस आत्मविश्वास से दी थी उसे देखकर लगा कि यह बात अब न बोलूँ। घूँट भरी। कुल्हड़ की मिट्टी की गंध थी, थोड़ी इलायची थी, और एक अजीब सी संतुष्टि थी जो ज़्यादा मीठेपन के बावजूद टिकी रही।
शास्त्री पार्क पहुँचा तो पता चला कि जिस गेट की तरफ़ मैं आया था, वह बंद था — बोर्ड लगा था "नवीनीकरण कार्य जारी है।" दूसरे गेट तक घूमकर जाना पड़ा। उसमें पाँच मिनट लगे जो मैं नोटबुक में लिख सकता था, पर नहीं लिखे। कभी-कभी अनुभव बस चलते रहने में होता है।
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