आज स्टाफ रूम में रीना मैडम किसी से कह रही थीं — "बच्चे सुनते नहीं इसलिए घर बिगड़ता है।" मैं वहीं से गुज़र रही थी, चाय का कप हाथ में था। रुकी नहीं, पर कुछ रुक गया अंदर — कंधों में एक हल्की कसावट आई, जबड़ा थोड़ा भींचा। विचार आया: यह सुनकर मुझे अटकना क्यों पड़ा? और भावना — झुंझलाहट नहीं ठीक से, कुछ थकान-जैसा, जैसे यह वाक्य मैंने पहले भी बहुत बार सुना है और हर बार थोड़ा-थोड़ा जमा होता रहा है। शरीर ने पहले जाना, सोच बाद में आई, भावना को नाम देने में एक और पल लगा।
इस हफ्ते का प्रयोग चल रहा है — रात नौ बजे के बाद फोन को दूसरे कमरे में रखना। परिकल्पना यह थी कि नींद गहरी होगी और सुबह कंधे कम अकड़े मिलेंगे। आज तीसरा दिन है। कल रात यह हुआ कि फोन तो गया, पर किताब उठाई और बारह बजे तक पढ़ती रही। नींद का समय नहीं बदला — सिर्फ माध्यम बदला। शायद असली चर मेरा जागते रहने का आग्रह है, फोन महज़ एक बहाना था।
परिकल्पना (संशोधित): नौ बजे के बाद कोई भी स्क्रीन नहीं, किताब भी तेज़ रोशनी में नहीं।
अवधि: इस शुक्रवार तक।
जाँच: सुबह उठते वक्त कंधे और आँखों के पीछे की तन्मयता या थकान।
आज सुबह आँखें थोड़ी भारी थीं — वह थकान जो सोचने में नहीं, बल्कि देखने में महसूस होती है। बालकनी पर बैठी थी, चाय थंडी हो रही थी, और मैं सोच रही थी कि यह भारीपन कब आता है ठीक-ठीक: खाने के बाद, किसी लंबी मुलाकात के बाद, या किसी चुप्पी के बाद जिसे मैंने खुद चुना। अभी डेटा कम है, इसलिए कोई नतीजा नहीं।
एक सवाल अटका हुआ है: जब मैं किसी सहकर्मी की बात से असहमत होती हूँ और कुछ नहीं कहती — क्या वह सचमुच एक चुनी हुई चुप्पी है, या थकान को समझदारी का नाम दे रही हूँ?
अगले दो दिन यही देखूँगी — जब कुछ न कहूँ, तो बाद में कंधे कैसे रहते हैं, साँस कैसी होती है। अभी कोई जवाब नहीं चाहिए।
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