आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज सुबह जब माँ का फ़ोन आया — बस हाल-चाल पूछने वाला, दस मिनट का — तो मेरे कंधे पहले ही थोड़े चढ़ गए...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में मिसेज़ देशपांडे ने किसी से कहा — "बच्चों को बस थोड़ी ज़्यादा मेहनत चाहिए,...
आज स्टाफ रूम में रीना मैडम किसी से कह रही थीं — "बच्चे सुनते नहीं इसलिए घर बिगड़ता है।" मैं वहीं से...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में चाय की केतली के पास खड़े-खड़े अनुराधा मैडम ने कहा — "बच्चों को बस थोड़ा...
आज सुबह खिड़की के पास बैठे हुए मैंने देखा कि धूप कैसे धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थी। पहले एक पतली रेखा, फिर एक चौकोर टुकड़ा, और फिर पूरा फर्श सुनहरा हो गया। मैं सोच रही थी कि हम अक्सर इस प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ कर देते हैं—चीज़ें कैसे धीरे-धीरे बदलती हैं। हम बस शुरुआत और अंत देखते हैं, बीच का सफर भूल जाते हैं।
कल मैंने एक छोटी सी गलती की। मैं अपनी चाय में चीनी डालना भूल गई, और पहला घूंट कड़वा लगा। पर मैंने उसे वैसे ही पिया। आधे कप के बाद मुझे एहसास हुआ कि कड़वाहट भी एक स्वाद है, न कि किसी चीज़ की कमी। शायद हम ज़िंदगी में भी ऐसा ही करते हैं—जो नहीं है उसे खोजते रहते हैं, और जो है उसे देखना भूल जाते हैं।
दोपहर में एक पड़ोसी ने कहा, "तुम हमेशा इतनी शांत क्यों रहती हो?" मैं मुस्कुरा दी। मुझे नहीं पता था कि क्या कहूं। शायद शांति कोई चुनाव नहीं, बल्कि एक अभ्यास है? या फिर यह सिर्फ मेरा तरीका है चीज़ों को समझने का।
मैंने आज एक छोटा सा प्रयोग किया। मैंने पांच मिनट के लिए बस अपनी सांसों को गिना। कोई ध्यान नहीं, कोई तकनीक नहीं—सिर्फ एक, दो, तीन... दस तक, और फिर दोबारा। यह अजीब था कि इतनी सरल चीज़ में भी मेरा मन कितनी बार भटका। पर हर बार जब मैं वापस आई, मुझे लगा जैसे मैं अपने आप से दोबारा मिल रही हूं।
क्या आप भी आज पांच मिनट निकाल सकते हैं? बस बैठिए, और अपनी सांसें गिनिए। कोई लक्ष्य नहीं, कोई सही या गलत नहीं। बस देखिए कि क्या होता है। और अगर आपका मन भटक जाए, तो उसे भी देखिए—बिना किसी निर्णय के। शायद वहीं कोई छोटा सा उत्तर छिपा हो।
शाम की हवा में एक अजीब सी ठंडक थी। मैंने सोचा, हम सब कहीं न कहीं अपने अंदर के सवालों के जवाब ढूंढ रहे हैं। और शायद जवाब मिलते नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उभरते हैं—बिल्कुल सुबह की धूप की तरह।
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