आज सुबह खिड़की के पास बैठी थी जब एक चिड़िया आकर बाहर की रेलिंग पर बैठ गई। उसने अपने पंख फड़फड़ाए, इधर-उधर देखा, और फिर उड़ गई। कुल मिलाकर शायद दस सेकंड। पर मैं सोचती रह गई—क्या उसके मन में भी कोई योजना थी? क्या वो भी सोचती है, "आज यहाँ बैठूंगी, फिर वहाँ जाऊंगी"?
मेरी सूची में आज सात काम थे। सात। और मैंने तीन पूरे किए। बाकी चार को देखकर थोड़ा अजीब लगा—जैसे मैं खुद से ही नाराज़ हूँ। फिर याद आया कि चिड़िया को कोई सूची नहीं बनानी पड़ती। वो बस होती है। तो क्या मैं भी बस हो सकती हूँ?
दोपहर में एक दोस्त ने फोन पर कहा, "तुम बहुत सोचती हो।" मैंने हंसकर कहा, "हाँ, यही तो मेरी समस्या है।" पर शायद समस्या नहीं है। शायद ये मेरा तरीका है दुनिया को समझने का। हर सोच एक सवाल है, हर सवाल एक रास्ता।
शाम को चाय बनाते समय मैंने देखा कि पानी उबलने से पहले छोटे-छोटे बुलबुले बनते हैं। वो इतने हल्के होते हैं कि लगता है अभी फूट जाएंगे, पर वो धीरे-धीरे बड़े होते हैं। शायद मेरे विचार भी ऐसे ही हैं—पहले अधूरे, फिर धीरे-धीरे साफ होते जाते हैं।
एक छोटा सा प्रयोग: कल सुबह पाँच मिनट के लिए बस बैठ जाना। कुछ सोचना नहीं, कुछ करना नहीं। बस देखना—खिड़की से बाहर, दीवार पर, अपनी हथेलियों पर। क्या पता, शायद उस ख़ामोशी में कोई जवाब मिल जाए जो शब्दों में नहीं है।
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