आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज सुबह जब माँ का फ़ोन आया — बस हाल-चाल पूछने वाला, दस मिनट का — तो मेरे कंधे पहले ही थोड़े चढ़ गए...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में मिसेज़ देशपांडे ने किसी से कहा — "बच्चों को बस थोड़ी ज़्यादा मेहनत चाहिए,...
आज स्टाफ रूम में रीना मैडम किसी से कह रही थीं — "बच्चे सुनते नहीं इसलिए घर बिगड़ता है।" मैं वहीं से...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में चाय की केतली के पास खड़े-खड़े अनुराधा मैडम ने कहा — "बच्चों को बस थोड़ा...
आज सुबह चाय बनाते समय एक अजीब बात नोटिस की। पानी उबल रहा था और मैं बस उसे देख रहा था—बुलबुले बनते, फूटते, फिर नए बनते। अचानक ध्यान आया कि मेरे मन में भी विचार कुछ ऐसे ही आते-जाते हैं। एक विचार आता है, थोड़ी देर रुकता है, फिर गायब हो जाता है। लेकिन हम अक्सर हर विचार को पकड़कर रखने की कोशिश करते हैं, जैसे वो हमारा स्थायी हिस्सा हो।
दरअसल, यह एहसास तब हुआ जब मैं एक पुराने दोस्त के बारे में सोच रहा था। कल उसका मेसेज आया था, सिर्फ एक लाइन—"बहुत दिन हो गए, कैसे हो?" मैंने तुरंत जवाब नहीं दिया क्योंकि मन में यह सवाल चल रहा था: क्या मैं सच में कैसा हूँ? यह सवाल इतना सरल है, फिर भी इसका जवाब देना मुश्किल लगता है। हम अपनी भावनाओं को शब्दों में बाँधने की कोशिश करते हैं, लेकिन अक्सर वे शब्दों से बड़ी होती हैं।
मैंने एक छोटा प्रयोग किया। पाँच मिनट के लिए फोन एक तरफ रखा और बस बैठकर अपनी साँसों को महसूस किया। कोई ध्यान की कोशिश नहीं, बस साँस लेना और छोड़ना। उन पाँच मिनटों में कम से कम बीस बार मेरा ध्यान भटका—कभी कल की एक मीटिंग याद आई, कभी लगा कि किचन में कुछ आवाज़ आई। लेकिन हर बार जब ध्यान भटका, मैंने बस वापस साँस पर ध्यान लगाया। कोई जज्बा नहीं, कोई निराशा नहीं।
इस छोटे से अनुभव ने मुझे सिखाया कि मन का भटकना गलती नहीं है, यह मन का स्वभाव है। असली बात यह है कि हम उसे वापस कैसे लाते हैं। जिस तरह पानी में बुलबुले अपने आप फूटते हैं, विचार भी अपने आप जाते हैं—अगर हम उन्हें जाने दें।
शाम को मैंने उस दोस्त को जवाब दिया: "ठीक हूँ, बस जिंदगी चल रही है। तुम सुनाओ?" कभी-कभी सबसे ईमानदार जवाब सबसे सरल होता है।
अगर आप चाहें तो आज एक छोटा सा प्रयोग करें: एक मिनट के लिए रुकें और अपने आसपास की तीन आवाज़ें सुनें। कोई भी आवाज़—पंखे की, बाहर की गाड़ियों की, अपनी साँस की। बस सुनें, बिना किसी विश्लेषण के। यह एक मिनट आपको खुद से थोड़ा करीब ला सकता है।
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