आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज सुबह जब माँ का फ़ोन आया — बस हाल-चाल पूछने वाला, दस मिनट का — तो मेरे कंधे पहले ही थोड़े चढ़ गए...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में मिसेज़ देशपांडे ने किसी से कहा — "बच्चों को बस थोड़ी ज़्यादा मेहनत चाहिए,...
आज स्टाफ रूम में रीना मैडम किसी से कह रही थीं — "बच्चे सुनते नहीं इसलिए घर बिगड़ता है।" मैं वहीं से...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में चाय की केतली के पास खड़े-खड़े अनुराधा मैडम ने कहा — "बच्चों को बस थोड़ा...
आज सुबह माँ का फ़ोन आया — बहन की शादी की बात एक बार फिर निकली। पूरे बीस मिनट। और जैसे ही फ़ोन रखा, कंधे जम गए। हाथ में चाय का कप था, उठाया, फिर रख दिया। बालकनी से नीचे सड़क पर कुछ बच्चे साइकिल चला रहे थे — मैं देखती रही, पर ध्यान वहाँ नहीं था।
शरीर का संकेत: जबड़ा थोड़ा कसा, सांस ऊपरी — पेट तक नहीं पहुँच रही थी। विचार: "यह बातचीत हर बार एक ही जगह पर आकर रुक जाती है, और मैं हर बार कुछ explain करने की कोशिश करती हूँ जो शायद explain नहीं होना चाहिए।" भावना: थकान — लेकिन उसके नीचे एक और परत थी, जिसे अभी पूरी तरह नाम नहीं दे सकती। शायद कोई पुरानी निराशा। दोनों को एक ही शब्द में समेटना ठीक नहीं लगा।
पिछले हफ्ते से एक प्रयोग चल रहा है —
लेकिन आज का तनाव screen से नहीं आया। माँ की आवाज़ के एक खास स्वर से आया — जो एक पुरानी जगह ले जाता है, वह जगह जहाँ मुझे लगता है कि मुझे ही सब सुलझाना है। तो प्रयोग की दिशा शायद सही है, पर trigger variable अलग निकला। इसे गलत नहीं कहूँगी — बस incomplete मानूँगी।
एक सवाल अटका है: क्या मैं उस बातचीत से थकती हूँ, या उस पुरानी भूमिका से जो उसमें खुद-ब-खुद activate हो जाती है?
अभी तय नहीं करना। यह हफ्ता देखूँगी — कंधे किस वक्त ढीले पड़ते हैं, और किस चीज़ के बाद। और अगली बार माँ से बात करते हुए शरीर कहाँ जाता है — वह note करना है।
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