रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आख़िरी बॉक्स बांधा। कमरा खाली था — सिवाय उस नोकिया के चार्जर के, जो खिड़की के पास की दरार में अभी भी फँसा था।
दीवार पर टेप के चार निशान थे। उसने हाथ लगाया — कागज़ की तरह ठंडे। वहाँ पहले कैलेंडर था, दूसरी वाली की तरफ़ से लगाया हुआ, उस साल का जो अब रहा नहीं। उसे याद नहीं था उस साल में क्या हुआ था। बस इतना याद था कि दिसंबर में एक दिन वो कैलेंडर खुद ही नीचे गिर गया था। टेप फिर भी रहा।
बाहर से ऑटो का हॉर्न आया। उसने जवाब नहीं दिया।
पाँच साल में कितनी बार वो रात को छत पर गई थी, वो याद नहीं। पर याद था एक रात — बारिश के ठीक बाद — जब मिर्ची की थाली छज्जे पर छूट गई थी और सुबह वो सूख चुकी थी। जैसे बारिश हुई ही नहीं थी। जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।
चाबी मेज़ पर रखनी थी जाने से पहले। पर मेज़ भी नहीं थी अब। सोफ़ा भी नहीं। वो खाली जगह, जहाँ कभी एक थर्मस रखा रहता था — वहाँ बस एक गोल निशान था ज़मीन पर, धूल में।
उसने चाबी मुट्ठी में भींची, एक बार। फिर दरवाज़े के नीचे की दरार देखी — वहाँ से रोशनी आती थी, बाहर के बल्ब की। पड़ोसन का बल्ब, जो हमेशा जलता था। चाहे रात हो, चाहे भोर।
नोकिया का चार्जर खिड़की की दरार से निकाला। बॉक्स में नहीं रखा। बैग में डाला।
बाहर ऑटो वाले ने फिर हॉर्न दिया। इस बार उसने बैग उठाया। दरवाज़ा बंद किया — आवाज़ धीमी थी, जैसे घर ने ख़ुद खींच लिया हो उसे। जैसे एक लंबी साँस हो।
चाबी उसने बाहर की खिड़की की मुँडेर पर रख दी। पड़ोसन को पता था।
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