आज सुबह खिड़की के पास बैठी थी जब एक पुरानी कविता की पंक्ति याद आई—"शब्द वही होते हैं जो चुप्पी को तोड़ते हैं, बाकी सब शोर है।" मैंने अपनी डायरी खोली, लेकिन कलम हाथ में लेते ही वह सफेद पन्ना मुझे घूरने लगा। कुछ दिन पहले एक कहानी शुरू की थी—एक औरत के बारे में जो अपने ही घर में खो जाती है। लेकिन आज उसका अंत नहीं मिल रहा था।
बाहर गली में किसी बच्चे की आवाज़ आई, "अम्मा, यह तितली कहाँ जा रही है?" मां ने कुछ जवाब दिया होगा, पर मुझे सुनाई नहीं दिया। बस वह सवाल रह गया। मैंने सोचा, शायद मेरी कहानी की औरत भी यही पूछ रही है—कहाँ जा रही हूँ मैं?
दोपहर में चाय बनाते हुए एक छोटा सा प्रयोग किया। हमेशा तीन चम्मच चीनी डालती हूँ, आज दो ही डाली। स्वाद अलग था—कड़वा नहीं, बस असली। चाय के कप को दोनों हाथों से पकड़ा, उसकी गरमाई हथेलियों में महसूस की। सोचा, क्या मैं अपनी कहानियों में भी बहुत मीठापन घोल देती हूँ? क्या डर है मुझे सच्चाई की कड़वाहट से?
शाम को फिर से कलम उठाई। इस बार अंत नहीं ढूंढा, बीच से शुरू किया। औरत रसोई में खड़ी है, खिड़की से छनकर आती रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही है। वह मुस्कुरा रही है, पर उसकी आँखें कहीं और देख रही हैं। बस। बाकी पाठक तय करे।
कभी-कभी अधूरापन ही पूरा होता है।
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