सुबह की धूप खिड़की के शीशे पर तिरछी पड़ रही थी, और मैं सोच रही थी कि कहानियाँ कहाँ से आती हैं। कल रात एक सपना देखा था—एक औरत समुद्र के किनारे खड़ी थी, उसके हाथ में एक ख़त था जो वह कभी नहीं भेज पाई। जब आँख खुली तो वह औरत मेरे साथ थी, मेरे कमरे में, मेरी साँसों में। मैंने सोचा, शायद यही तो है लिखना—उन चीज़ों को पकड़ लेना जो सपने और जागने के बीच की दरार में फँस जाती हैं।
दोपहर को मैं बाज़ार गई। सब्ज़ी वाले ने पूछा, "क्या लोगी?" और मैंने टमाटरों को छूते हुए कहा, "जो ताज़े हों।" वह हँसा। "सब ताज़े हैं, दीदी।" पर मुझे पता था कि कुछ टमाटर दूसरों से ज़्यादा लाल थे, कुछ में धूप की गंध थी। मैंने वही चुने। रास्ते में सोचती रही—क्या शब्द भी ऐसे ही होते हैं? कुछ ताज़े, कुछ बासी, कुछ में अभी भी मिट्टी की खुशबू बची होती है?
शाम को लिखने बैठी तो वह औरत फिर आ गई। मैंने उससे पूछा, "तुम्हारा ख़त किसके लिए था?" उसने जवाब नहीं दिया। बस समुद्र की तरफ़ देखती रही। मैंने सोचा, शायद कुछ सवालों के जवाब नहीं होते। शायद कुछ कहानियाँ अधूरी रहने के लिए ही बनती हैं। मैंने उसके बारे में दो पन्ने लिखे, फिर रुक गई। बहुत कुछ कहने से कभी-कभी कम कहा जाता है।
रात को चाय पीते हुए खिड़की से बाहर देखा। कोई गा रहा था, दूर से। आवाज़ अधूरी-सी थी, टूटी हुई, पर सुंदर थी। मैंने सोचा—यही तो है ज़िंदगी। अधूरी, टूटी, फिर भी सुंदर। और शायद यही लिखना है—उन टूटी हुई आवाज़ों को सहेजना, उन ख़तों को पूरा करना जो कभी भेजे नहीं गए।
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