सुबह की धूप खिड़की के शीशे पर तिरछी पड़ रही थी, और मैंने देखा कि धूल के कण उसमें कैसे नाच रहे थे—बिल्कुल वैसे जैसे किसी अनकही कहानी के शब्द मन में तैरते हैं। मैं कॉफी बनाने उठी, लेकिन चीनी की जगह नमक की डिब्बी उठा ली। पहले घूंट में ही पता चल गया। यह छोटी सी गलती याद दिला गई कि ध्यान कहाँ था—कल रात लिखी उस अधूरी कविता में, जिसके आखिरी शब्द अभी भी ढूँढ रहे हैं अपनी जगह।
दोपहर में बाजार गई। सब्जीवाली ने पूछा, "बहन, आज क्या चाहिए?"
मैंने कहा, "जो ताजा हो।"
उसने मुस्कुराकर टमाटर थमाए, और कहा, "ये देखो, सुबह के आए हैं। बिल्कुल आपकी कहानियों जैसे—नए और रसीले।"
मैं हँस पड़ी। उसे कैसे पता कि मैं लिखती हूँ? शायद मेरी आँखों में वह भाव होगा जो शब्दों में जीने वाले लोगों के पास होता है।
शाम को मैंने एक प्रयोग किया। एक ही दृश्य—बारिश में भीगता हुआ बरगद का पेड़—दो तरह से लिखा। पहली बार केवल वर्णन किया, दूसरी बार उस पेड़ को एक बूढ़े व्यक्ति की तरह देखा जो अपनी यादों में खोया हो। दूसरा वाला ज्यादा जीवित लगा। जैसे शब्द साँस ले रहे हों।
रात अब गहरा रही है। खिड़की के बाहर कोई गा रहा है—पुरानी धुन, टूटे हुए शब्द। मैं सोच रही हूँ कि कहानियाँ कहाँ से आती हैं। शायद वे हवा में तैरती रहती हैं, और हम बस उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं, जैसे बचपन में तितलियाँ पकड़ते थे—धीरे से, डर के साथ कि वे उड़ न जाएँ।
आज मैंने सीखा कि गलतियाँ भी एक तरह की कविता होती हैं। नमक वाली कॉफी, गलत शब्द, अधूरे वाक्य—सब कुछ हमें यह सिखाते हैं कि पूर्णता में नहीं, खोज में सच्चाई है।
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