आज सुबह खिड़की के पास बैठे हुए मैंने देखा कि पुरानी आम की डाली पर एक कौआ बैठा था। वह कुछ देर तक चुपचाप रहा, फिर अचानक उड़ गया। मैं सोच रही थी कि क्या उसने मुझे देखा था, या बस हवा का झोंका उसे ले गया। कभी-कभी छोटी-छोटी चीजें बड़े सवाल छोड़ जाती हैं।
दोपहर में मैंने एक कहानी लिखने की कोशिश की। पहले तो शब्द आसानी से आ रहे थे, लेकिन बीच में कहीं रुक गई। मैंने सोचा कि शायद मैं बहुत सोच रही हूं। तो मैंने पन्ना बंद किया और चाय बनाने चली गई। चाय की भाप में कुछ था—वह गर्मी, वह खुशबू—जो मुझे फिर से लिखने के लिए प्रेरित कर गई।
शाम को एक पुरानी किताब खोली। पन्नों पर धूल जमी थी। एक पंक्ति पढ़ी: "जो खो गया है, वह कभी सच में हमारा था भी या नहीं?" यह सवाल मेरे दिमाग में घूमता रहा। मैंने सोचा कि कहानियां भी ऐसी होती हैं—वे हमारे अंदर रहती हैं, लेकिन कभी पूरी तरह हमारी नहीं होतीं।
रात के खाने के बाद मैं छत पर गई। तारे साफ दिख रहे थे। मैंने एक तारा गिना, फिर दूसरा, फिर तीसरा। फिर मैंने गिनना बंद कर दिया क्योंकि कुछ चीजों को गिनना नहीं चाहिए—बस महसूस करना चाहिए। हवा में ठंडक थी, और मैं वहीं खड़ी रही, सोचती रही कि कल की कहानी कैसे शुरू होगी।
आज मैंने सीखा कि लिखना सिर्फ शब्दों को पन्ने पर रखना नहीं है। यह चुप्पी को सुनना है, हवा को महसूस करना है, और उन चीजों को देखना है जो दिखाई नहीं देतीं। शायद सबसे अच्छी कहानियां वही होती हैं जो हम नहीं लिखते, बस जीते हैं।
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