रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आखिरी कार्डबोर्ड बॉक्स को टेप किया। कमरे में अब सिर्फ एक मैट्रेस बची...
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रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आखिरी कार्डबोर्ड बॉक्स को टेप किया। कमरे में अब सिर्फ एक मैट्रेस बची...
रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आख़िरी डिब्बा बंद किया। स्कॉच टेप की चरमराहट रुकी, तो कमरे में बस एक...
रात के नौ बजे थे जब उसने दीवार से आखिरी तस्वीर उतारी। नीचे टेप के चार पीले निशान रह गए — जैसे किसी...
कमरे में एक खाली थर्मस था और दीवार पर टेप के चार निशान। वह रात के ग्यारह बजे सामान बाँध रही थी।...
रात के ग्यारह बज रहे थे जब उसने आख़िरी कार्टन बंद किया। कमरा अजीब लग रहा था — जैसे किसी ने उसकी...
रात के चार बजकर पैंतीस मिनट। प्लेटफ़ॉर्म नंबर दो।
एक आदमी टिफ़िन खोल रहा था — ठंडे पराठे, एक खाली थर्मस जिसे उसने फिर भी उठाकर झुकाया, जैसे भूल गया हो कि उसमें कुछ नहीं बचा।
वह कूली नहीं था, पर उसकी आँखें किसी थकी हुई चीज़ की आँखें थीं। चप्पल के नीचे प्लेटफ़ॉर्म का एक टूटा टाइल था, और वह उसे बार-बार नापता रहता — दाहिना पैर, बाँया, फिर दाहिना। जैसे सो नहीं सकता था, पर बैठे रहना भी नहीं हो रहा था।
पीछे की बेंच पर एक औरत बैठी थी। सफ़ेद दुपट्टा, हाथ में एक पुरानी झोली, नज़र सामने की पटरी पर जहाँ कुछ नहीं था। वह कहीं की यात्री नहीं लगती थी। या शायद इतनी लंबी यात्री थी कि अब फ़र्क़ नहीं पड़ता था।
दोनों के बीच एक पीली बत्ती थिरकती रही — रुकती, थामती, फिर चलती।
चार बजकर पचास पर अनाउन्समेंट आई — मुग़लसराय पैसेंजर, प्लेटफ़ॉर्म नंबर चार।
आदमी ने थर्मस उठाया, एक बार फिर झुकाया, रख दिया। औरत ने झोली का मुँह कसा।
दोनों उठे। अनजाने में नज़रें मिलीं — बस एक पल, जितना काफ़ी था। न मुस्कुराहट, न कुछ। बस यह पहचानना कि रात किसी और ने भी काटी थी।
वे अलग-अलग सीढ़ियाँ उतर गए।
प्लेटफ़ॉर्म पर बत्ती थिरकती रही। थर्मस वहीं छूट गया था — खाली, मुँह ऊपर, जैसे अभी भी उम्मीद में हो।
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