आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज सुबह जब माँ का फ़ोन आया — बस हाल-चाल पूछने वाला, दस मिनट का — तो मेरे कंधे पहले ही थोड़े चढ़ गए...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में मिसेज़ देशपांडे ने किसी से कहा — "बच्चों को बस थोड़ी ज़्यादा मेहनत चाहिए,...
आज स्टाफ रूम में रीना मैडम किसी से कह रही थीं — "बच्चे सुनते नहीं इसलिए घर बिगड़ता है।" मैं वहीं से...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में चाय की केतली के पास खड़े-खड़े अनुराधा मैडम ने कहा — "बच्चों को बस थोड़ा...
आज सुबह स्टाफ रूम में सुना — एक सहकर्मी किसी से कह रही थीं, "वो बच्चा बस ध्यान खींचने के लिए करता है।" वाक्य पूरा होने से पहले ही कंधे थोड़े ऊपर चले गए। छाती में एक हल्की जकड़न। यह थकान नहीं थी, यह कुछ और था — शायद विरोध, या उस बच्चे की तरफ से कुछ जो मैं महसूस कर रही थी जो मुझे करना नहीं था।
बाद में मैंने अलग करके देखा: शरीर का संकेत था — कंधे, जकड़न। विचार था — "यह परिभाषा गलत है।" भावना थी — एक अजीब सी तकलीफ जो मेरी नहीं थी, फिर भी थी। तीनों अलग थे, पर पहले एक ही गांठ लग रहे थे।
इस हफ्ते का प्रयोग चल रहा है — रात 9 बजे के बाद फोन नीचे रखना, और सोने से पहले सिर्फ एक लाइन लिखना: "आज शरीर में क्या था?" तीसरा दिन है।
स्टाफ रूम की वह बात अभी भी कहीं है। मैं उसे सुधारने नहीं गई, कुछ बोला भी नहीं। वह चुप्पी मैंने चुनी थी — पर नहीं जानती अभी यह सही था या नहीं। एक सवाल रह गया: क्या मेरी चुप्पी उस बच्चे के लिए थी, या अपनी ऊर्जा बचाने के लिए?
कल देखूँगी — सुबह उठते ही पहला विचार क्या है। और वह कंधे की जकड़न कब आती है, किस संदर्भ में।
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