आज सुबह खिड़की के पास बैठकर चाय पी रही थी, और एक अजीब सी बात ध्यान में आई। कप से उठती भाप को देखते हुए मैंने सोचा – यह भाप कितनी जल्दी गायब हो जाती है, लेकिन जब तक है, तब तक इसकी उपस्थिति पूरी तरह असली है। हमारे विचार भी कुछ ऐसे ही हैं, क्या नहीं? वे आते हैं, कुछ पल रहते हैं, और फिर विलीन हो जाते हैं। फिर भी हम उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं, जैसे कोई भाप को मुट्ठी में बंद करने की कोशिश करे।
कल एक छोटी सी गलती हुई। किसी से बात करते हुए मैंने बीच में ही टोक दिया, यह सोचकर कि मुझे पता है वे क्या कहने वाले हैं। बाद में महसूस हुआ कि मैंने सुना ही नहीं – मैं तो सिर्फ अपने अनुमान सुन रही थी। यह एक अच्छी सीख थी: हम कितनी बार वास्तविकता की जगह अपनी व्याख्या को सुनते हैं?
दोपहर में एक छोटा सा प्रयोग किया। पांच मिनट के लिए बस बैठी रही, कुछ किया नहीं। न फोन, न किताब, न कोई काम। पहले दो मिनट बहुत असहज थे – मन ने सौ जगह जाने की कोशिश की। "यह बेकार है," "समय बर्बाद हो रहा है," "कुछ उपयोगी करो" – ये सब विचार आए। लेकिन तीसरे मिनट के बाद कुछ बदला। एक अजीब सी शांति आई, जैसे किसी भीड़ भरे कमरे में अचानक सन्नाटा हो गया हो।