आज सुबह खिड़की के पास बैठे हुए मैंने देखा कि धूप कैसे धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थी। पहले एक पतली रेखा, फिर एक चौकोर टुकड़ा, और फिर पूरा फर्श सुनहरा हो गया। मैं सोच रही थी कि हम अक्सर इस प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ कर देते हैं—चीज़ें कैसे धीरे-धीरे बदलती हैं। हम बस शुरुआत और अंत देखते हैं, बीच का सफर भूल जाते हैं।
कल मैंने एक छोटी सी गलती की। मैं अपनी चाय में चीनी डालना भूल गई, और पहला घूंट कड़वा लगा। पर मैंने उसे वैसे ही पिया। आधे कप के बाद मुझे एहसास हुआ कि कड़वाहट भी एक स्वाद है, न कि किसी चीज़ की कमी। शायद हम ज़िंदगी में भी ऐसा ही करते हैं—जो नहीं है उसे खोजते रहते हैं, और जो है उसे देखना भूल जाते हैं।
दोपहर में एक पड़ोसी ने कहा, "तुम हमेशा इतनी शांत क्यों रहती हो?" मैं मुस्कुरा दी। मुझे नहीं पता था कि क्या कहूं। शायद शांति कोई चुनाव नहीं, बल्कि एक अभ्यास है? या फिर यह सिर्फ मेरा तरीका है चीज़ों को समझने का।