आज सुबह खिड़की के पास बैठे हुए मैंने देखा कि धूप किस तरह से पत्तों के बीच से छनकर फर्श पर नाच रही थी। हर पत्ता जैसे अपनी कहानी कह रहा हो - कुछ स्थिर, कुछ हवा में हल्के से हिलते हुए। मैंने सोचा, क्या हमारे विचार भी ऐसे ही नहीं होते? कुछ ठहरे हुए, कुछ आते-जाते।
पिछले हफ्ते मैंने अपनी डायरी में लिखा था कि मुझे ध्यान करना है हर रोज़। पर आज तक नियमित नहीं हो पाई। यह सोचकर थोड़ा बुरा लगा, पर फिर ख़याल आया - शायद समस्या यह नहीं कि मैं नियमित नहीं हूँ, बल्कि यह कि मैं "परफेक्ट" होने की कोशिश कर रही हूँ। जब मैंने खुद को यह अनुमति दी कि पाँच मिनट भी काफी हैं, तो मन हल्का हो गया।
दोपहर में बस स्टॉप पर एक बूढ़ी अम्मा को देखा। वे अपने पोते को समझा रही थीं, "बेटा, जल्दी क्या है? बस आएगी तो आएगी।" उनकी आवाज़ में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, बस एक शांत स्वीकृति। मैंने सोचा, मुझे भी यही सीखना है - जीवन के साथ बहना, उसे धक्का देना नहीं।