आज सुबह बाज़ार गई तो ताज़ा हरी मेथी देखकर रुक गई। पत्तियाँ इतनी कोमल और चमकदार थीं कि हाथ अपने आप उनकी ओर बढ़ गया। दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा, "आज सुबह ही आई है, बिल्कुल ताज़ी।"
घर आकर जब मैंने मेथी को धोया, तो उसकी वह खास कड़वी-मीठी महक रसोई में फैल गई। मुझे अचानक नानी की याद आ गई – वे हमेशा कहती थीं कि मेथी में जान होती है, बस उसे समझना आना चाहिए। पहले मैं सोचती थी यह बस एक कहावत है, लेकिन आज जब मैंने पत्तियों को बारीक काटा, तो समझ आया कि हर सब्ज़ी को अपना समय और अपनी आँच चाहिए।
कढ़ाई में जीरा छौंकते समय मैंने एक छोटी सी गलती की – तेल थोड़ा ज़्यादा गर्म हो गया और जीरा जलने लगा। तुरंत आँच कम की और प्याज़ डाल दिए। सौभाग्य से स्वाद पर कोई असर नहीं हुआ, लेकिन यह याद दिला गया कि खाना बनाना सिर्फ़ विधि नहीं, समय और ध्यान का खेल है।