आज सुबह खिड़की के पास बैठी थी, और धूप की एक पतली रेखा मेरी नोटबुक के पन्नों पर तिरछी पड़ रही थी। मैंने सोचा था कि आज एक कहानी लिखूंगी—एक ऐसी कहानी जो पूरी हो जाए। लेकिन कलम उठाते ही अहसास हुआ कि शब्द वहीं अटके हुए हैं, जहां कल छोड़े थे।
मैंने एक पुरानी आदत दोहराई। पहला वाक्य लिखा, फिर काटा। दूसरा लिखा, फिर उसे भी। तीसरी बार में समझ आया कि मैं शुरुआत से डरती नहीं, बल्कि बीच से डरती हूं। वो हिस्सा जहां पात्र अपनी असलियत दिखाने लगते हैं, और मुझे तय करना होता है कि उन्हें टूटने दूं या बचा लूं।
दोपहर में चाय बनाते हुए एक आवाज़ सुनी—बाहर से, शायद किसी बच्चे की हंसी। उसमें कुछ ऐसा था, जैसे किसी ने अचानक कोई राज़ खोल दिया हो। मैंने सोचा, क्या कहानियां भी ऐसे ही शुरू होती हैं? एक आवाज़, एक झलक, और फिर सब कुछ खुलने लगता है।
शाम को फिर उसी नोटबुक के पास लौटी। इस बार मैंने शुरुआत की जगह बीच से लिखना शुरू किया—वो दृश्य जहां सब कुछ बदलता है। अजीब लगा, लेकिन शब्द चलने लगे। जैसे उन्हें सिर्फ एक रास्ता चाहिए था, भले ही वो उल्टा हो।
अब रात है, और कहानी अधूरी है। लेकिन कम से कम वो है। कल शायद शुरुआत लिख लूं, या शायद अंत। शायद यही सीखना था आज—कि हर चीज़ क्रम में नहीं आती, और यह ठीक है।
मैंने आखिरी पंक्ति पढ़ी जो लिखी थी: "वो खड़ी रही, इंतज़ार करते हुए कि कोई उसे बुलाए। लेकिन आवाज़ उसी के भीतर से आई।"
शायद यह मेरे लिए भी है।
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