सुबह की धूप खिड़की के शीशे पर तिरछी पड़ रही थी, और मैंने देखा कि धूल के कण उसमें नाच रहे थे—बिना किसी संगीत के, बिना किसी मकसद के। मैं सोच रही थी कि क्या हर कहानी को एक मकसद चाहिए, या कुछ कहानियाँ बस इसी तरह तैरती रहती हैं, बेमतलब, खूबसूरत।
पिछले हफ्ते मैंने एक किरदार लिखा था—एक बूढ़ी औरत जो हर शाम अपनी छत पर आकर चिड़ियों से बातें करती थी। लेकिन आज सुबह जब मैंने वह पन्ना दोबारा पढ़ा, तो मुझे लगा कि मैं उसकी आवाज़ सुन ही नहीं पा रही। मैंने उसे बताया था कि वह अकेली है, लेकिन मैंने उसे महसूस नहीं होने दिया। तो मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया—मैंने उसकी बातचीत हटा दी और सिर्फ उसकी चुप्पी को लिखा। उसके हाथ जो दाना फेंकते हैं, रुकते हैं, फिर से फेंकते हैं। अजीब बात है, अब वह ज़्यादा ज़िंदा लग रही है।
दोपहर में चाय बनाते हुए मेरी बहन ने पूछा, "तुम हर दिन लिखती हो, पर किसके लिए?" मैंने कहा, "शायद खुद के लिए।" वह हँसी, "तो फिर इतनी मेहनत क्यों?" मेरे पास कोई जवाब नहीं था। लेकिन बाद में मुझे याद आया कि रूमी ने कहा था, "जो तुम खोजते हो, वही तुम्हें खोज रहा है।" शायद कहानियाँ भी ऐसी ही हैं।
शाम को मैंने फिर से वह किरदार उठाया। इस बार मैंने उसे छत पर नहीं, सीढ़ियों पर बैठाया—न ऊपर, न नीचे, बस बीच में। वहीं जहाँ हम सब अटके रहते हैं। अब वह सही लग रही थी। अधूरी, लेकिन सही।
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