शाम की धूप खिड़की के शीशे पर तिरछी पड़ रही थी, और मैं सोच रही थी कि कहानियाँ कहाँ से आती हैं। पिछले हफ्ते से एक किरदार मेरे दिमाग में घूम रहा है—एक बूढ़ा किताब विक्रेता जो अपनी दुकान में रात को ठहरता है। लेकिन आज जब मैंने लिखना शुरू किया, तो शब्द आए नहीं। बस वही ख़ाली पन्ना, कर्सर की टिमटिमाहट, और मेरी उँगलियाँ कीबोर्ड पर ठहरी हुईं।
फिर मुझे याद आया—पिछले महीने एक पुराने बुकस्टॉल पर मैंने एक विक्रेता से पूछा था, "आपकी सबसे पुरानी किताब कौन सी है?"
उसने मुस्कुराते हुए कहा था, "पुरानी तो बहुत हैं, लेकिन सबसे क़ीमती वो है जो कोई ख़रीदता नहीं।"
मैंने पूछा था क्यों, तो उसने बस कंधे उचका दिए थे।
आज मैंने सोचा कि शायद मेरी यही ग़लती है—मैं हमेशा परफ़ेक्ट किरदार, परफ़ेक्ट कहानी ढूँढ़ती हूँ। लेकिन असल ज़िंदगी में तो अधूरी बातें, अनकहे जवाब, और वो किताबें जो कोई नहीं ख़रीदता—यही तो सबसे दिलचस्प हैं।
मैंने आज एक छोटा प्रयोग किया। उस बूढ़े किताब विक्रेता की कहानी लिखने की बजाय, मैंने सिर्फ़ उस एक सवाल को लिखा जो वो रात को अपनी दुकान में अकेला बैठकर ख़ुद से पूछता होगा। बस एक सवाल। कहानी ख़ुद-ब-ख़ुद खुलने लगी।
शायद कहानियाँ जवाबों से नहीं, सवालों से बनती हैं। शायद अधूरापन ही उन्हें ज़िंदा रखता है।
अब शाम ढल चुकी है। खिड़की के बाहर किसी की साइकिल की घंटी बज रही है, और मैं सोच रही हूँ—कल किस किरदार का सवाल लिखूँगी।
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