सुबह की धूप खिड़की से आई तो मैंने देखा—धूल के कण हवा में तैर रहे थे, जैसे किसी अनकही कहानी के अक्षर। मैं बिस्तर पर बैठी रही, बस देखती रही। कभी-कभी लिखने से पहले सिर्फ देखना ज़रूरी होता है।
दोपहर में चाय बनाते समय एक पंक्ति ज़हन में आई—"वो लौटा नहीं, पर उसकी परछाई रोज़ दरवाज़े पर दस्तक देती है।" मैंने तुरंत नोटबुक खोली, लेकिन जब लिखने बैठी तो शब्द वैसे नहीं थे। वे भारी हो गए थे, बोझिल। मैंने समझा—कुछ पंक्तियाँ सिर्फ हवा में ही अच्छी लगती हैं, काग़ज़ पर नहीं।
शाम को पड़ोस की बच्ची आई। उसने पूछा, "आप पूरे दिन क्या करती हैं?" मैंने मुस्कुराकर कहा, "सोचती हूँ।" वो हँसी, "बस? कुछ करती नहीं?" मैं क्या कहती—सोचना भी एक काम है, शायद सबसे कठिन।
रात को मैंने फिर वही पंक्ति लिखने की कोशिश की। इस बार मैंने एक शब्द बदला—परछाई की जगह ख़ामोशी रख दी। अजीब बात है, एक शब्द बदलने से पूरा अर्थ बदल गया। कहानी किसी और की हो गई।
अब मैं जानती हूँ कि कल मुझे उस पंक्ति को छोड़ देना होगा। कुछ शब्द बीज की तरह होते हैं—ज़मीन में दबे रहने दें, तो शायद कभी कोई पेड़ बन जाएँ। जल्दबाज़ी में उखाड़ दें, तो बस एक टूटी हुई उम्मीद।
मैं खिड़की से बाहर देख रही हूँ। अँधेरे में भी वे धूल के कण कहीं हैं, तैर रहे हैं, किसी अनकही कहानी का इंतज़ार कर रहे हैं।
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